mrityu



मृत्यु 

mrityu


मृत्यु तूं सत्य है, पर डरावनी नहीं
निडर है तुझसे मनुष्य , बना कोई कहानी नई
दो जहाँ के बीच की कड़ी  है तू
हर पल हर छण  सामने खड़ी है तू

विचलित करते ह्रदय को, तेरे विचार है
जर्जर ,बूढी, थकी  हड्डियों को तेरा इन्तजार है
कुछ तो विचार कर मानवता के दुश्मनो का
पापी ,अत्याचारी , रक्तपिपासु  और  भ्रष्टाचारी दुर्जनो का 
पर तुझको तो साधु और सज्जनो  से ही प्यार है
जिनका कारोबार ही परोपकार है 


अमर होने की चाह नहीं मुझको 

तुझसे मिलने की परवाह नहीं मुझको 
पता है  मिलूंगा तुझसे किसी दिन
ए  खुदा  जीवन के हर रंग दे मुझको 

तू छणिक है, पर सुन्दर नहीं 
तूं कही बाहर है ,पर  मेरे अंदर नहीं 
तू लेती है , मैं देता हूँ 
तू बेरंगी है ,मैं रंग बिरंगा हूँ 

तूं मैं को हरने वाली है 

मैं ,मैं में रहने वाला हूँ 


तूं अपनी करने वाली है 
मैं अपना करने वाला हूँ 
तूँ एक अंधेरी हवेली है 
मै उसमे दीप जलाने वाला हूँ 



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bjp ka rag congresi aur ek desi

बीजेपी का राग कांग्रेसी और एक देसी  - 



इधर कुछ दिनो से भारतीय राजनीति मे एक नये तरह का गीत सत्ता पक्ष द्वारा गुनगुनाया जा रहा है जिसे राग कांग्रेसी कहा जाता है . राग कॉंग्रेसी मे आवश्यकता और समय की नजाकत के अनुसार केवल उसके बोल मे परिवर्तन किया जाता है .



भारतीय जनता पार्टी इसी राग को गाते हुए सन 2014 मे सत्ता मे आई थी . और आज अपनी हर गलती पर इसी राग का सहारा लेकर जनता का मनोरंजन करती है . जिस भाजपा ने काग्रेस के शासन काल मे तेल के मूल्यो मे वृद्धि का विरोध किया था , जिसने तेल मूल्य का बाजार के अनुसार निर्धारण का भी विरोध किया था वह आज गरीबो का तेल निकालने पर तुली हुई है . अंतराष्ट्रीय बजार मे तेल के दाम लगातार घटने के बावजूद भारत मे खुदरा मूल्यो मे वृद्धि निरंतर जारी है .

सरकार से पूछने पर उसका वही कांग्रेसी राग शुरु हो जाता है की कांग्रेस के समय भी कीमते 80 के पार गई थी . परंतु यह नही बताया जाता की जिस तेल का मूल्य अंतराष्ट्रीय बजार मे आज 75 डॉलर प्रति बैरल के आस - पास है , कांग्रेस के समय 144 पर पहुंच गई थी . एक तरफ जहां आपको राम मंदिर के लिये माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय का इंतजार है वही उसी उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार किया की एससी /एसटी एक्ट मे सवर्णो के खिलाफ अधिकतर मामले फर्जी होते है इस कारण प्राथमिकी दर्ज होते ही उनकी तत्काल गिरफ्तारी ना की जाये लेकिन आपको उच्चतम न्यायालय का न्याय पसंद नही आता है और सवर्णो के खिलाफ उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को नीचा दिखाने के लिये संसद मे बिल पारित करवा दिया .


उच्चतम न्यायालय ने सिर्फ इतना ही कहा था की जांच के बाद ही दोषी पाये जाने पर गिरफ्तारी हो अर्थात पीड़ित को न्याय मिले लेकिन कही किसी के झूठ के चक्कर मे कोई दूसरा प्रताडित ना हो जाये . जिस जीएसटी का आप 12 % पर विरोध कर रहे थे उसे आप 5 ,, 12 , 18 और 28 % की दर से लेते आये . अभी भी व्यापारी जीएसटी को समझने मे अपना माथा खपा रहे है .

आपकी बातो मे पहले 70 साल अब 60 साल देश की दुर्दशा के लिये कांग्रेस जिम्मेदार होती है .और 60 सालो से देश का विकास ठप्प है . और आपने आकर 4 सालो मे देश की अर्थव्यवस्था को नया मुकाम दे दिया है , आप ने ही देश मे डिजिटल क्रांति लाई है , आपने ही रेल से लेकर दिल्ली मेट्रो तक की नीव रखी है .


आप के अनुसार इंदिरा गाँधी बहुत ही लचर प्रशासक थी . परंतु क्या कोई जिम्मेदारी आपके चुनावी घोषणा पत्रो मे किये गये वादो के लिये नही बनती . आप चार साल से सत्ता मे रहने के बाद भी कॉंग्रेस को पानी पी पी कर कोसते है , आप स्थानो जैसे सड़क ,रेलवे स्टेशन इत्यादि के नाम सिर्फ इसलिये बदलते है की कांग्रेस भी ऐसा करती थी . आप ने अटल की अस्थि यात्रा सिर्फ इसलिये निकाली की कांग्रेस भी ऐसा करती थी , वैसे यह काम आपलोगो ने भले ही कांग्रेस की नकल कर के किया हो लेकिन अच्छा ही किया वर्ना जिस अटल जी की सुध आप लोग नही लेते थे कम से कम कांग्रेस के कारण मरणोपरांत ही सही थोड़ी इज्जत तो अटल जी को दी . फिर तो आपके अनुसार कांग्रेस जो करती थी वो सब सही है क्योंकि आप भी तो उसी रास्ते पर चल रहे है . अगर आपने इन चार सालो मे सिर्फ कांग्रेस को कोसना छोड़कर कोई और काम किया है तो वो है सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण अभी एक साल और बाकी है , कुछ बचा हो तो उसे भी देख लीजिये , घबडाइए मत इसका रिकार्ड आप ही के नाम रहेगा नाकी कांग्रेस के .

और लौटने के बाद एक नजर क्योटो बनी काशी पर और देश के बाकी स्मार्ट शहरो पर पर भी जरूर डालियेगा . उसके बाद उस गंगा मा से भी जरूर मिलिएगा जो आपको बुलाती रही है और जिसे आपने गंदगी के दामन से मुक्ति का वादा किया था .

देश का किसान भी आपसे अपनी दुगनी आय का तरीका पूछने के लिये कतार मे खड़ा है और साथ मे वे करोड़ो युवा भी आपसे अपने मन की बात करने वाले है जिनको आपने पकौड़ी बेचने के काम पर लगाया था . कतार से बाहर ऐसे लोगो की भी भीड़ है जो देशभक्ति के प्रमाणपत्रो के वितरण का इंतजार कर रहे है . और खाली बैंक खातो , खाली सिलेंडर और खाली पेट के साथ ही इस देश के गरीब भी .


atal ki kavita



Hindi motivational  श्रृंखला की शुरुआत आज महान कवि और राजनेता अटल बिहारी बाजपेयी जी की उस कविता की चँद पंक्तियों  से की जा रही है जिसमे उन्होंने जीवन में कभी भी आशा और उम्मीद को टूटने ना देने को कहा है। 






टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं

atal bihari bajpeyi ki asthiya aur modi sarkar


अटल बिहारी बाजपेयी की अस्थियाँ और मोदी सरकार 



atal bihari bajpeyi ki asthiya aur modi sarkar


अटल बिहारी बाजपेयी भारतीय राजनीति का वो प्रथम चेहरा जिसने पहली बार बिना पूर्ण बहुमत के पांच साल गैर कांग्रेसी सरकार का संचालन किया।  दो सीटों से शुरू उनका सफर उनके मजबूत इरादों और वाकपटुता की  कौशल की बदौलत  केंद्र में सरकार बनाने तक एक ऐसा मुकाम तक पहुँच चुका  था जहाँ वे सीधे तौर पर   लोगो के दिलो में जगह बनाने में कामयाब हुए। यह बाजपेयी जी की स्वच्छ  और उदारवादी  छवि का ही  परिणाम है की जिस भारतीय जनता  पार्टी ने  राजनीति से सन्यास लेने के बाद उनकी कोई खबर नहीं ली आज उनकी अस्थियो से  भी राजनीतिक लाभ लेने से बाज नहीं आ रही है , वो भी ऐसे समय जब पार्टी द्वारा मोदी को पार्टी और देश का  सबसे लोकप्रिय नेता बताया जा रहा है।

atal bihari bajpeyi ki asthiya aur modi sarkar


आखिर ऐसा कुछ तो हुआ होगा जिससे भारतीय जनता पार्टी और  उसकी पार्टी के सबसे बड़े और लोकप्रिय  नेता  भी आज एक मृत व्यक्ति की लोकप्रियता और उसके आचरण को भुनाने में लगे हुए है।

कारण जानने के लिए हमें दोनों का तुलनात्मक रूप से अध्ययन करना पड़ेगा।
माना जाता है की बाजपेयी पार्टी का वह उदारवादी चेहरा थे जिनकी देशभक्ति पर विपक्ष भी विश्वास करता था इसी कारण  नरसिम्हा राव की सरकार ने विश्व के मंच पे विपक्ष में रहते हुए भी बाजपेयी जी को भारत का पक्ष रखने को भेजा था।
जबकि मोदी को  खुद उनकी पार्टी के ही कई नेता  शक की नजरो से देखते है। इसका कारण यह है की  लालकृष्ण आडवाणी ,मुरली मनोहर जोशी  और यशवंत सिंह समेत तमाम ऐसे बड़े नेता है,  जिन्होंने पार्टी को इस मुकाम तक पहुँचाया की उसे संसद में विपक्ष का दर्जा मिल सके।  और बाजपेयी जी ने पहली बार गठबंधन की राजनीति में भाजपा  सरकार का पांच वर्षो का कार्यकाल पूरा किया।  आज वही नेता मोदी द्वारा किनारे लगा दिए गए।  कभी आडवाणी के ही कहने पर अटल जी ने मोदी को अभयदान दिया था , वही आडवाणी आज राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लायक भी नहीं समझे गए।
अटल जी ने हर चुनावी दौरों में जो सत्य था उसी को आधार बनाते हुए अपने भाषण दिए जबकि मोदी द्वारा दिए  आंकड़े ही गई बार गलत होते रहे है भाषण की तो बात अभी दूर है। 

अटल ने कभी सत्ता का मोह नहीं किया उनके लिए देशहित सर्वोपरि था।  इसलिए विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने सरकार की उन बातो का न केवल समर्थन किया बल्कि धन्यवाद भी दिया जो राष्ट्रहित में थी , यही वजह थी की सरकार भी उनसे अनेक मुद्दों पर सलाह लिया करती थी। अटल जी ने कभी देशभक्ति का दिखावा नहीं किया और नाहीं अपने हिन्दू होने का।


वहीं  वर्तमान सरकार सत्ता की चाहत में हिन्दू और मुसलमानो में वैमनस्य की भावना भरने में लगी हुई है।  अगर सरकार को देश की चिंता होती तो वह इन मुद्दों को हवा देने की बजाय इनको शान्त करने में अपना योगदान देती। सत्ता की चाह ने प्रेस को भी नहीं छोड़ा और उनपर भी नियंत्रण की कोशिशे  होती रही ।


atal bihari bajpeyi ki asthiya aur modi sarkar


मोदी सरकार  यदि  गुजरात मॉडल के बलबूते सत्ता पर आई है तो उसे इन चार सालो में किये गए विकास कार्यो को जनता के सामने रखना चाहिए नाकि अटल जी जैसे महान इंसान की अस्थियो को , जिनको जनता एक नेता से ऊपर उठकर देखने लगी है। सरकार को अपने चुनावी घोषणापत्र को जो उसने 2014 के चुनावों में छपवाए थे उनका वितरण हर क्षेत्र में करना चाहिए  अटल जी की अस्थियों का। और अगर सरकार ऐसा नहीं कर पाती तो उसे अपने गिरेबां में जरूर एक बार झाकना चाहिए।



महान नेता और महान कवि श्री  अटल बिहारी बाजपेयी जी की कुछ अटल पंक्तियाँ आपसे जरूर साँझा करना चहूंगां। 



बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।




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                         मोदी बनाम विपक्ष 




kavi



कवि 



kavi



कवि हूँ , मैं देश दुनिया की छवि हूँ मैं
 हर युग को गाता हूँ मै , हर युग में जाता हूँ मैं
मुहब्बत का पैगाम देता,रवि हूँ मै

मैंने देखे है खून से सने मैदानों को
मैंने देखे है मरते वीर जवानो को
मैंने देखा है बिलखती माँओं को
मैंने देखा है विपदा की घनघोर घटाओ को
कविता में जब इन छणो को पिरोता हूँ
मैंने देखा है रोते श्रोताओ को


त्रेता से लेकर कलियुग तक

और राम के उस सतयुग तक
स्त्री को बिलखते देखा है
उस युग की द्रोपती से लेकर
इस युग की निर्भया तक को तड़पते देखा है

मैंने देखा है राजाओ के अहंकारो को 
और उन्ही राजाओ की जलती चिताओ को 
मैंने देखा है आम्भी और जयचंद जैसे गद्दारो को 
और प्रताप से लेकर भगत सिंह जैसे शूरमाओं को 

अग्नि में समाहित सती को भी देखा है 
और सावित्री जैसी हठी को भी देखा है 
मैंने देखा है झाँसी की मर्दानी को 
और सिंघनी जैसी दुर्गावती रानी को 


हर युग की अपनी एक कहानी है 


कभी गाँधी कभी जयप्रकाश की आंधी है 
तस्वीरें बनती है और बिगड़ती 
सब कवि की कविता में झलकती है 

लिखता वही हूँ जो सही होता है 
हर काल को 
चंद पंक्तियों में 
पिरोने वाला ही कवि होता है। ..... 





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kahani

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कहानी 



बहुत दिन हो गए थे कोई कहानी लिखे सोचा आज जरूर लिखूंगा आखिर कही ना कही मन में अपूर्वा की कही बातें घूम रही थी की आप कहानी बहुत अच्छा लिखते है मेरे बेटे के लिए एक लिख दीजिये न प्लीज।

अपूर्वा मेरी क्लास मेट थी स्नातक के प्रथम वर्ष से ही मैं उसे जानता था , कारण वह मेरे बड़े भाई साहब के दूर के रिश्ते की साली भी लगती थी लेकिन कभी उससे मुलाकात नहीं थी।

वो तो एक दिन उसकी माँ अपूर्वा के साथ  भाई साहब से मिलने चली आई थी शायद कुछ काम था उनको। तभी बातों - बातों में पता चला की उसने भी  स्टीफेंस कॉलेज में एडमिशन लिया है। भाई साहब ने मुझको आवाज लगाई " सुनील "
मैं उनकी आवाज सुनकर दौड़ा चला आया भाई साहब एकदम नपे तुले और अनुशासनवादी इंसान थे  जिस वजह से उनका भय और सम्मान दोनों ही हमारे ह्रदय में रहता था।

" ये देखो ये अपूर्वा है तुम्हारे ही कॉलेज में पढ़ती है "
मैंने सहमति से सिर हिला दिया  " जी भैया "
मैं वहा सर झुकाये खड़ा रहा जब तक की वे लोग चले ना गए


उसके बाद अक्सर ही अपूर्वा से कॉलेज में मुलाकात हो जाती थी धीरे - धीरे मुलाकात कब प्यार में बदल गया पता ही ना चला।


kahani

अब तो बिना उसके मन ही नहीं लगता था। जिस दिन वह कॉलेज नहीं आती ,उस दिन ऐसा लगता जैसे पूरा कॉलेज ही वीरान हो गया है। चाहे लड़कपन का प्यार कहिये या जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही होने वाला पहला प्यार। पर दीवानगी में कही कोई कमी नहीं थी ,
दोनों ने निश्चय किया की बात अब घर वालो को बता देनी चाहिए।  वो बरसात की रात थी जब दोनों इस निश्चय से अपने घरो की ओर एक दूसरे से विदा हुए की जल्द ही घरवालों की मर्जी से  एक हो जायेंगे और पूरा जीवन एक दुसरे के प्यार में बिता देंगे।

पर घर पहुँचते ही जो बम का गोला गिरा उसके तबाही के निशान आज भी मौजूद है , अपूर्वा की माँ ने उसकी शादी अमेरिका में रहने वाली उसकी सहेली के बेटे से तय कर दी थी और उसी रात उनकी फ्लाइट होने की वजह से मंगनी होनी थी । अपूर्वा ने लाख समझाने की कोशिश की पर किसी ने उसकी एक नहीं सुनी।



आता हूँ  - दरवाजे की घंटी के साथ ही मेरी चेतना भूत से वर्तमान में आ जाती है।

" साहब आपका टेलीग्राम आया है "  - कहते हुए डाकिया दो लिफाफे  मेरे हाथ में थमा देता है।



एक में शायद कोई सरकारी पैगाम था - तो राज्य सरकार इस साल का श्रेष्ठ साहित्य पुरस्कार मुझे देने जा रही है , पढ़कर मन प्रसन्न हुआ और उसकी कही  एक बात याद आ गई कॉलेज के दिनों से ही अपूर्वा मेरे लिखे पत्रों को देखकर कहती थी तुम एक दिन बड़े लेखक जरूर बनोगे जितनी गहराई तुम्हारे शब्दों में है मैंने उतनी बहुत ही कम लेखकों की कलम में देखी है तुम तो जिसको प्रेम पत्र लिखोगे वो  तुम्हारी ही हो जाएगी तब लेखक जी  मुझे भूल तो नहीं जाओगे।

काश तुम्हारी कही बाते सही हो जाती , ये लेखक का दिल ही तो था जिसने अपने दिल और  जीवन में तुम्हारे सिवा किसी और को ना रखा सिवा तन्हाई के।

तुम्हारी मुस्कुराहट भरी तस्वीर देखकर ही दिल को तसल्ली मिल जाती थी , तुम्हारी खुशियों से ही ये दिल खुश हो जाता था। किन्तु जब तुम्हारे  ऊपर प्रकृति ने दुखो का पहाड़ गिरा दिया तब से ये दिल आज तक रोता ही आया है , किसे पता की 15 दिन पहले तुम्हारी खुशियों की वो आखरी उड़ान होगी जिसमे तुमने अपने पति को मुस्कुराते हुए विदा किया था।  और उसके बाद तुमने यहीं बसने की सोच ली ताकि अपने सास ससुर की सेवा कर सको।

इस दूसरे लिफाफे में क्या है शायद किसी की मेडिकल रिपोर्ट है , ये तो .......अपूर्वा के पति की रिपोर्ट है उन्हें क्या हो गया था   
 ........ ....... इसमें तो लिखा है वे पिता बनने के लिए पूरी तरह फिट नहीं थे  ......
फिर ये ........ अपूर्वा का ..... बेटा  .... ...... . वो बरसात की रात .........


लेखक द्वारा क्वोरा पर लिखित एक जवाब से साभार-

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navjot singh siddhu - imran khan



नवजोत सिंह सिद्धू - इमरान खान 

navjot singh siddhu - imran khan

पाकिस्तान में इस माह होने वाले चुनावों में इमरान खान की पार्टी तहरीक - ए - इन्साफ (p t i ) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और इमरान खान उस पार्टी के सबसे बड़े नेता। इमरान खान क्रिकेट की दुनिया को अलविदा कहने के बाद से ही राजनीति में सक्रिय  थे। और उन्होंने तहरीक - ए - इन्साफ नामक पार्टी का गठन किया। जैसा की सबको पता है खान अपने व्यक्तिगत जीवन में काफी विवादित रहे , उनकी पूर्व  पत्नियों ने उनपर कई आरोप  लगाए परन्तु इससे उनकी लोकप्रियता पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा। 


क्रिकेट में भी खान ने पाकिस्तान को इकलौता विश्वकप 1992 में अपनी कप्तानी में दिलाया था। क्रिकेट जगत में कई उपलब्धियां उनके नाम पर आज भी दर्ज है। सिद्धू से लेकर गावस्कर तक उनके मित्र हुआ करते थे यही वजह है की अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने सिद्धू , कपिलदेव और गावस्कर को आमंत्रित किया था। 

गावस्कर और कपिलदेव तो नहीं जा पाए किन्तु सिद्धू अपने मित्र के शपथ ग्रहण समारोह में खुद को जाने से नहीं रोक पाए। गावस्कर और कपिलदेव ने अलग - अलग कारणों का हवाला देते हुए जाने से इंकार कर दिया। 
इसको लेकर भारत में काफी हो हल्ला  मचा की क्या सिद्धू का जाना सही था।  सिद्धू ने भी वापस आकर कहा की उनका जो आजतक यहाँ  नहीं मिला वह पाकिस्तान में दो दिन में ही मिल गया। सिद्धू ने भी इमरान खान की तरह राजनीतिक महारत हासिल कर ली है इसी वजह से चर्चा होना लाजिमी है। 

भारत और पकिस्तान के सम्बन्ध जग जाहिर है।  इधर कश्मीर को लेकर कुछ अर्से से दोनों देशो में तनाव देखा जा सकता है , इमरान खान ने भी आते ही यह साफ़ कर दिया की वह कश्मीर मुद्दे पर कोई नरमी नहीं बरतने वाले। मोदी सरकार की भांति ही उन्होंने पाकिस्तान के लोगो से वादों की झड़ी लगा दी  , उन्होंने सादगी दिखाते हुए प्रधानमंत्री आवास में रहने से मना कर दिया जहाँ सैकड़ो कर्मचारी और गाड़ियाँ है ,वो तो अपने घर में ही रहना चाहते थे किन्तु सुरक्षा कारणों से सैन्य आवास को ही अपना घर बना लिया।  


पाकिस्तान के अन्य हुकुमरानों से भले ही इमरान खान अलग हो या खुद को अलग दिखाने की कोशिश कर रहे हो परन्तु कश्मीर मसले पर वे पूर्वर्ती  सरकारों के बनाये राह पर ही चलते हुए दिख रहे है। यही वजह है की सिद्धू  के पकिस्तान मेहमाननवाजी के अलग - अलग अर्थ लगाए जा रहे है।  कइयों का मानना है की इमरान खान ने भारतीय प्रधानमंत्री को न्यौता नहीं दिया था जबकि सिद्धू पूर्व में भाजपा में उपेक्षित  होने  की अपनी भड़ास निकालने और भारतीय प्रधानमंत्री को नीचा  दिखाने पाकिस्तान पहुँच गए। वैसे सिद्धू ने इसे सियासी रंग ना देते हुए  दोस्ताना बताया और शांति का पैगाम देने वाला बताया है । किन्तु विवाद यही तक होता तो गनीमत थी  उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी सेना प्रमुख को गले भी लगा लिया  इसके पीछे सिद्धू की भावना जो भी रही हो  किन्तु जब आप सियासत में होते है तो सब कुछ सियासी ही हो जाता है। 

navjot singh siddhu - imran khan


सोशल मीडिया पर सिद्धू पाकिस्तान जाने को लेकर काफी ट्रोल हो चुके है कइयों ने तो उन्हें भारत विरोधी भी बता डाला है , अनेक राजनीतिक दलों ने सिद्धू पर निशाना साधा है शिवसेना ने तो इसे राष्ट्रविरोधी तक करार दे दिया है। खैर विवाद तो चलता ही रहेगा किन्तु दोस्ती और देश में सिद्धू के लिए क्या जरुरी था यह तो वही जाने। 



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मुल्क 


वे कहते है की मुल्क उनका है ये कहते है की मुल्क इनका है 
 चले जाएँ सरहदों पर कहने वाले ये मुल्क जिनका है 

मेरे मुल्क से मेरी वफादारी के सबूत मांगते है वो 

जिनके महलो में लगने वाले पत्थर भी विलायती है 

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कुछ शोर सा उठता है इस अहदे -  वतन में 
सत्ता के लिए सब कुछ जायज है इस चमन में 
कुछ काटेंगे कुछ चाटेंगे ,
कुर्सी के पीछे सारे भागेंगे 
मुल्क के लिए कौन करता है कुछ 
यहाँ दंगे भी होते है सत्ता के लिए और  मत पूछ 

मुल्क के लिए हँसते हुए जान दे देते है वो 
जिनके लिए मुल्क और माँ एक होती है 
चंद अल्फाज ही निकलते है इन हुक्मरानो के मुखड़े से 

जिसमे शहीद को भारत माँ का वीर सपूत बतलाते   है 

और अगले ही दिन उस उस बेचारी माँ को भी नहीं पहचान पाते है 
वो कहते है की वो मुल्क के रखवाले है 
मैं कहता हूँ वे देश को लूटने वाले है 


कोई देशभक्ति का ओढ़े चोला 
उसके अंदर बम का गोला 
कोई विदेशी सरकार चलावे 
क्या वो देश का हो पावे 
कोई बांटे हिन्दू -  मुस्लिम 
कोई बाँटे माटी - जाति 
मैं तो खड़ा मौन मेरे मौला  
जबसे सियासत ने ओढ़ा धर्म का चोला 


गुलाम हुआ अपनों से ही मुल्क मेरा 
अब तो होगी क्रांति 
मेरा रंग दे बसंती चोला। 



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सावन

                                                                      
sawan

भीगे - भीगे से दिन है
भीगी सी राते
बाहर आने को है कुछ जज्बाते
बरखा है  उमंग है
जब तू मेरे संग है

वो पहले सावन का झूला

अबकी बार भी ना मन भूला
तुझे याद है वो चुपके से लहलहाते हुए
धान के खेतो को देखना
उन नन्हे पौधो की हरियाली में जिंदगी को ढूंढना 
वो मेले में  हरी चूड़ियों को खरीदने की ललक
और उस लम्बी टोपी वाले  जादूगर की एक झलक 
शिवालय में शिव भक्तो की लम्बी कतार 
उस पर से नागपंचमी का त्यौहार 
हर सावन ऐसेा ही हो मन भावन 
हर झूले पर हो तेरा साथ 
मुश्किलें चाहे कितनी भी आये 

तुम रहना हमेशा साथ 




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तूफ़ान 

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खुद को रोक पाते हो तो रोक लो
जो तूफ़ान सा उठ रहा है सीने में तुम्हारे
वो दुनियां की ही तो देन है
हो सके तो बदल लो खुद को ज़माने के लिए
माना की खून गर्म है तुम्हारा
पर थोड़ा सा निकालो दिखाने के लिए

युग आये और युग चले गए
कुछ इतिहास बनाके गए कुछ खास बना के गए
जाना तो सबको है एक दिन
परंतु कुछ आस बनाके गए कुछ उदास बनाके गए

 तुमको लगता है की व्यवस्था ही ख़राब है
अरे ये जवानी की अवस्था ही ख़राब है
इसीलिए तो वो तुमको बहकाते है 
अगर ना बहके तो बहका हुआ बताते है

युवा शक्ति से ही राष्ट्र गतिमान होता है
पर गति की राह में कभी - कभी अभिमान होता है
तभी तो हर जगह
 तजुर्बा प्रधान होता है

चलो माना  की तुम और हम आजाद है
तुम व्यवस्था के मारे हो
हम अवस्था के मारे है

फिर ये जाति ,धर्म ,क्षेत्र के कैसे नारे है
हमको और तुमको मझधार में फंसा के
 हँसते वे किनारे है

लगता है एक तूफ़ान मेरे सीने में भी है
उठते हुए कहता है
क्या मजा....  ऐसे जीने में भी है  ?






लेखक की प्रतिलिपि पर प्रकाशित एक रचना 

https://hindi.pratilipi.com/read?id=6755373518941614


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noukari ki padhai aur padhai ki kamai me khote ham



नौकरी की पढाई और पढाई की कमाई में खोते हम 




बचपन से पढाई का केवल एक ही उद्देश्य रहा है नौकरी , शायद हर माँ - बाप  अपने अपने बच्चो को तालीम इसीलिए दिलाते ही है की बड़े होने पर वो ऊँचे ओहदे पर पहुँच सके अगर नहीं पहुँचता है तो उसके जीवन भर की मेहनत व्यर्थ हो जाती है अगर शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ नौकरी पाना ही है तो जिसको नौकरी न करनी हो तो वह फिर डिग्री लेकर क्या करेगा। और जो केवल डिग्री के भरोसे नौकरी पाते है उनका क्या ?


और यदि शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानी बनना है तो ऐसे लोगो को क्या कहेंगे जो आलिशान घरो में रहते हुए अपने माता - पिता  को किसी वृद्धाश्रम  में रखे हुए है।  जिनके लिए धन ही सब कुछ है और जिनकी  सभ्यता की पहचान डिस्को से होते हुए क्लब की पार्टियों में वेटरो को टिप देने तक ही सीमित है। जहाँ रिश्ते व्यक्ति की हैसियत और पहुँच देखकर बनाई जाती है , जहाँ ईमानदार और गरीब व्यक्तियों को देखकर मुंह बन जाता है।


 शिक्षा की शुरुआत परिवार से ही होता है जहाँ शुरू से ही सिखाया जाता है की जन्म लिया है तो बस मशीन बनने के लिए, जहाँ दिल और दिमाग से सोचना मना है बस किताबो को रटिये  और परीक्षा देते जाईये  और अगर कक्षा में उच्च स्थान नहीं प्राप्त किया तो  आप वहीं पढाई में कमजोर सिद्ध हो जाते है। और अगर जिंदगी ने कोई कड़ा इम्तेहान ले लिया तो तनाव का शिकार हो जाइये क्योंकि आपकी तालीम में इसका कोई अध्याय नहीं है । 


उसके बाद बच्चो  को कमजोर मानकर भारी भरकम टयुशन लगा दिया जाता है। इन्ही सब के बीच उनका वो बचपन हम छीन लेते है जो प्रकृति ने उन्हें दिया है  . जब हम घर  में मानवीयता और अपनेपन का अध्याय इस अंधाधुंध भौतिक जिंदगी में फाड़ के फेंक देते है तो हम कैसे उम्मीद कर सकते  है की वापसी में हमें ये सारी चीजे मिल भी सकती है।  . 
noukari ki padhai aur padhai ki kamai me khote ham

बड़े होते ही अभिभावकों की इच्छानुसार नौकरी की तलाश शुरू हो जाती है। लक्ष्य तो पहले ही निर्धारित कर दिया जाता है। नौकरी मिल गई तो  आधुनिक संसाधनों को पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत शुरू हो जाती है  ,पैसा आप कितना भी कमा लीजिये कम ही पड़ता है  . ऊपर से हम ठहरे भारतीय  जो सबसे ज्यादा पैसे के पीछे भागने वाले है। पर इसी कमाई और कमाई की पढाई ने एक बेटे को उसके बाप से दूर कर दिया , माँ की  ममता होमवर्क चेक करने तक रह गई , बहन और भाई बेगानो की तरह आपस में मिलते है ,खास रिश्तेदारों से तो सालो में एक बार मुलाकात होने लगी , वो भी औपचारिकता वाली मुलाकातों तक ही दौर सीमित रहता है । दोस्त तो अब मतलब के लिए बनाये जाने लगे उनमे अब पहले जैसी आत्मीयता कहा रही।  यही कारण है की आजकल के बच्चे थोड़े बड़े होते ही अपने अभिभावकों को जवाब देना शुरू कर देते है। और हम खुद से सवाल पूछने की बजाय की ऐसा क्यों हो रहा है उल्टे उनपे दोषारोपण करते है 
noukari ki padhai aur padhai ki kamai me khote ham
हम कहते है की हमारे पास समय नहीं है तो वाकई हमारे पास समय नहीं है क्योंकि अब  आप 100 साल जीने की उम्मीद नहीं कर सकते आप को जो भी करना है उसकी शुरुआत किये रहिये जिंदगी जीने पर यकीं कीजिये। क्योंकि मुर्दा इंसान ना डॉक्टर होता है ना कोई कलेक्टर। 
आपके जीवन यात्रा की शुरुआत हो चुकी है आपको खुद तय करना है की किन रास्तो से होकर गुजरना है बाकि  आखिरी मंजिल तो सबकी एक ही है  ....... 


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man ki baat 2


मन की बात - 2 

man ki baat 2


साहब आज एक बार हम फिर आप से अपने मन की बात करने वाले है पिछली बार तो उ आधार लिंक करवाने जाना था तो थोड़ा सा कहके निकल लिए इस बार साहब हमको लागत  है की आप पिछली बार से भी कम सोने लगे है तभी तो दिन रात एक करके सबके घर में चूल्हा लगवा दिए पर उ रामवृक्षवा के घर एक बार सिलेंडरवा ख़त्म हो गया तो उ फिर से  गोइंठा  पर बनाने लगा , हम पूछे तो झुट्ठे बोल दिया की सरकार  खाने का बेवत लायक छोड़े ही नहीं हमका   गैसवा  कहा से भरवाएंगे जौने मनई के दूकान पर ठेला चलात रहे उ नोटबंदी और जीएसटीये समझे  खातिर परेशान  रहा ये ही चक्कर में  दुकानदारी चौपट रही। व्यापारी तो खुदे कर्जा में चला गया  , आप उसकी बाती पे एकदम विश्वास मत कीजियेगा सरकार एक नंबर का झूठा है अभी पिछले ही महीने देखे थे चौधरी की दुकान से बड़का  नहाने वाला साबुन खरीदा था , इंहा  तो जमाना गुजर गया साबुन खरीदे। 



सुने है सरकार उ चाइना वाले डोकलाम में फिर से घुस आये है , इसीलिए हम कहते है थोड़ा आप भी अब विदेशवा  जाना  कम कर दीजिये इहा रहेंगे तो डर - भय बना रहेगा। वैसे भी आपको चाइना के माल और बात पर कम ही भरोसा करना चाहिए, ई सब हमेशा आपको भाउक करके फायदा उठा ले जाते है। 


सरकार  आप के काम से हम पूरा खुश है ,सुने थे सुप्रीम कोरट  उ छोट जात वाला कानून में कुछ करे रही। .... उ त अच्छा रहा की आप कानून ना बदले दिहे , इ ठकुरवा और पंडितवा  इतने से ही इतरा गए थे की अब कोई उनको झूठ मुठ में नहीं फंसा सकता। इनके पक्ष में सरकार कोई कानून मत बनाइयेगा नहीं तो इ फिर उतरा जायेंगे। एक तो पहले ही नौकरी में अरक्षणवा से जलते थे अब तो अउरी बउरा गए है बुझते थे की सरकार केवल उन्ही के है। अरे उ 200 में से 200 ला देंगे तब्बो सरकार नौकरी हमही को देंगे चाहे हम 50ए  नंबर काहे  ना लाये। 


एक थो हमारा पर्सनल रेक़ुएस्ट था सरकार आप से.......  अब हम गरीब मनई का जानी की आप उ स्मार्ट सिटी कहा बनाये है , और कहा से टिकट कटवाई आप ही दुगो  टिकटवा  निकलवा दीजिये ना.......  उ कलुआ के अम्मा भी कह रही थी की उसको भी देखना है की सरकार कैसा सुन्दर शहर बसाये है। और हाँ  ड्रइवरवा से कह दीजियेगा की ट्रेनवा टाइम पर लेते आएगा। कल्हिये भिनसारे रामखेलावन के लइका को छोड़े स्टेशन गए थे ट्रेन पकड़ाते - पकड़ाते  अगला दिन का दतुअन स्टेशनवे पे करना पड़ा. 
अच्छा सरकार अब हम चलते है अब तो आप भी आइयेगा ही अपने भाइयो और बहनो से मिलने  चुनाव में । ........ 


लेखक की इससे पहले की  प्रसिद्द रचना  -  मन की बात 

kaliyug



कलियुग 

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कलियुग शुरू हो गया है क्या  ?
लोगो की मति तो मारी ही जा रही है 
भीड़ भी बढ़ते ही जा रही है 
बेटा बाप को काट रहा है 
और बीवी के तलवे चाट रहा है 
रिश्तो की जगह कब धन ने ले ली पता ही ना चला  
हकीकत की जगह कब दिखावे ने ले ली पता ही ना चला 
राह चलते छोटी बात बड़ी बन जाती है 
अब तो यूरिया से भी रबड़ी बन जाती है 

दिमाग में भूसा और गुस्सा दोनों ही ज्यादा है 
आम आदमी मार - काट पे आमदा है 
कंक्रीट के जाल बिछते जा रहे है 
पेड़ और पहाड़ कटते जा रहे है 

विकास यही है क्या ?

आज का सभ्य समाज यही है क्या  ?
राजा खुद को भगवान कहने लगा है 
अब तो सुना है पहरेदारो के साथ , महलों में रहने लगा है 

खाली पेट बच्चे बड़े हो रहे है 
और वे करोडो खर्च करके चुनाव में खड़े हो रहे है 
बाप नौकरी की तलाश में भटक रहे है 
नए लड़के ढाढ़ी और बाल बढ़ा के मटक रहे है 
संत व्यापार और व्यभिचार में लिप्त है 
यह देख के जनता विक्षिप्त है 
स्त्री अपने अस्तित्व की लड़ाई में हार रही है 
और सफेदपोशो के कपडे फाड़ रही है 

रोज घट रही हजारो दुर्घटना है 
जान हुई सस्ती अब, गुलामो की तरह रोज खटना है 
सुना है इंसानो ने भी, आपस में नस्लों का बंटवारा कर लिया है 
खून तो एक ही है सबमे , शायद जमीर से किनारा कर लिया है 


अब क्या बचा है दाता के इस संसार में 

शायद वही प्रकट हो इस कलियुग में, अपने नए अवतार में 



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rajneetik sunyata


राजनीतिक शून्यता 



विगत कुछ दिनों से भारतीय राजनीति में एक शून्यता की स्थिति आ गई है।  भारतीय जनता पार्टी भी केवल इसी शून्य में समाहित होते दिख रही है। बिहार जैसे राज्य में जहाँ बीजेपी की सहयोगी पार्टी के मंत्री पर मुजफ्फरपुर काण्ड में संलिप्तता के आरोप लगने पर बीजेपी खामोश है वही दिन प्रतिदिन बढ़ने वाली दुष्कर्म की घटनाओ में ढिलाई बरतना अब बीजेपी की भी आदत बन चुकी है।


विपक्ष में रहते हुए बीजेपी ने जहाँ ऐसे मुद्दों को जोर शोर से उठाया था वहीँ सत्ता पक्ष में रहते हुए ख़ामोशी बनाये रखना उसके राजनीतिक सेहत के लिए घातक सिद्ध  हो सकता है।

दूसरी प्रमुख बात अनुसूचित जाती और अनुसूचित जनजाति के मामले में जहाँ शीर्ष कोर्ट ने स्वीकार किया था की देश में इस क़ानून के दुरूपयोग के  मामले बढ़ते ही जा रहे है। वही बीजेपी ने इस अध्यादेश को उच्च सदन में पास करवाकर यह दिखा दिया की वह अभी जाती की राजनीति में सबसे आगे खड़ी है।  इस विधेयक को पास करवाने के साथ ही भाजपा ने शायद अगड़ी जातियों के प्रति यह मान लिया है की वह इस एक्ट से प्रताड़ित नहीं होते। बल्कि सुप्रीम कोर्ट के इस तथ्य को भी नकारा है की इसका दुरूपयोग नहीं होता।


2019  के चुनावों को देखते  हुए इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता की अगर फायदे और नुक़्सान को निकाला जाये तो एक और जहा भाजपा को फायदा हो सकता है तो दूसरी तरफ अगड़ी जातियों से उसे नुकसान भी सहना पड़ सकता है। 

मोदी की लोकप्रियता 2014 के अनुरूप तो नहीं है परन्तु  राहुल गाँधी के विपक्ष में होने के नाते छवि स्वतः ही बन जाती है।  राहुल गाँधी को लेकर अभी कांग्रेस की ग़लतफ़हमी दूर नहीं हुई है तो 2019 के चुनावों के बाद वो भी दूर हो जाएगी।  फिलहाल जनता ने जिस सरकार को 2014 में पूरी उम्मीद के साथ चुना था सरकार उस उम्मीद पर कितनी खरी उतरी है उप चुनावों में जनता ने उसे बता दिया और जनता के सामने उचित विकल्प  का ना होना उसका दुर्भाग्य ही है और राजनीतिक पार्टियों का सौभाग्य। 



baat



बात 

                                                                        
baat

बात करते करते बात बन जाए तो क्या बात है 
और अगर बात करनी इतनी ही जरूरी थी तो बात की क्यों नहीं 
फिर बात बताते हो की बात हुई 
पर बात बताई नहीं उसको 
बात बताओगे नहीं तो उसकी बात पता कैसे चलेगी 

बात रखे रहने में भी कोई बात नहीं है 

बात बताने से ही बात बढ़ेगी 
फिर कुछ बात उधर से होगी 
हो सके बात ना बन पाए 
हो सके बातों का सिलसिला शुरू हो जाये 
पर बात बताना अदब से 
यही बात की कलाकारी है 
बातों से  ही तो आजकल जंग लड़ी जाती है 
बातों में ही तो सम्मोहन है 

अगर बात बन गई तो क्या बात है 

कुछ बात तुम्हारी होगी कुछ बात उनकी होगी 
औरो की बातों पर ध्यान मत देना 
उनको केवल बातो में मजा लेना है 
पर तुमको बातो से ही जीवन चलाना है 
यही बात है मेरी 
कुछ और बात है तो आओ बातें करे 





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inklaab jaruri hai


इंकलाब जरुरी है

inklaab jaruri hai


मर रहा किसान है देखो
कैसी उसकी मजबूरी है

कहता है रोम - रोम मेरा अब तो

इंकलाब जरुरी है

तब देश उन्होंने लूटा
अब देश इन्होने लूटा
कैसी जनता की मजबूरी है
अब तो इंकलाब जरुरी है

वे गोरे  थे  ये क्या काले है
दोनों ही देश को लूटने वाले है

तब लाठी का जोर यहाँ था
अब लालच का शोर यहाँ है
तब भी दंगे यहाँ हुए थे
अब भी दंगे कहाँ रुके है

कहने को है देश के बेटा

पर भरे स्विस बैंक की तिजोरी है
अब तो  इंकलाब जरुरी है

ना गई अपनी गरीबी देखो
हुए अमीर इनके करीबी देखो
वे विदेशी थे ये देशी है
पर नीयत एक जैसी है

भगत और  चंद्रशेखर को खोकर जो आजादी पाई थी
लगता है  शायद उसकी ज्यादा कीमत चुकाई थी
चेहरे शायद बदले है , जालिमो की नई जमात आई है
है तरीका अलग पर आपस में  मौसेरे भाई है


कितना रोकेंगे खुद को हम
छलियो और लुटेरों से

है देशभक्ति का खून भरा

रुकेगा ना ये रोके से


भगत सिंह और चंद्रशेखर बनना

हालात की मजबूरी है
वो क्रांति तब भी जरुरी थी
एक क्रांति अब भी जरुरी है



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तुमसे 

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तुम कहते हो की सावन की रिमझिम बुँदे

मेरी याद दिलाती है
तुम कहते हो की घनघोर घटा
राग मल्हारी गाती है

तुम कहते हो की मेरी पैजनिया की आहट
तुम्हे प्रफ्फुलित कर जाती है
मैं कहती हूँ तुम सावन के इंद्र धनुष जैसे
जीवन में खुशियों के रंग भर जाते हो

तुम एक मधुर साज मैं जीवन गीत तुम्हारी प्रियतम
है साँस तुम्हारी इस धड़कन  में
रहे साथ जीवन में हरदम

तुम कहते हो की दुःख की काली  रातो में
मैं उजियारी सुबह लाती हूँ
मैं कहती हूँ इन स्याह रातों में
तुमसे मिलने चली आती हूँ

अपने बगियाँ में सावन के झूले
उस पर मंद - मंद बर्षा  की बुँदे
मैं क्या झुलू सब कुछ भूलूँ
जब प्रतिक्षण साथ तुम्हारा हो

तुम ही बसंत तुम ही सावन
तुम प्रेम की सुगन्धित फुलवारी हो

सब कुछ तुमसे , तुममे सबकुछ

मैं कहती हो तुम मेरे कृष्ण मुरारी हो



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nakhda




नखड़ा


नई  नवेली बहु ने ससुराल आते ही नखड़ो की लाइन  लगा दी , लम्बी चौड़ी फरमाइशों के साथ मायके में गुड़िया की तरह रहने की कहानियाँ सुना डाली। बेचारी सास यह सोचकर हैरत में थी की ये आजकल की पीढ़ी को हो क्या गया है जहाँ जाओ वहा  यही कहानी सुनने को मिलती है आखिर इनकी माँ ने भी तो मेहनत कर के ही पाला होगा  बेचारी इनके पैदा होने से लेकर ससुराल में जाने तक इनका ख्याल रखा है और साथ में अपने घर के बूढ़े बुजुर्गो का ध्यान भी जिम्मेदारी पूर्वक निभाया है। फिर इनको ऐसा क्या हो जाता है की जवान होने पर भी इनका बचपना नहीं जाता। हमारी तो जैसे तैसे निकल जाएगी लेकिन इनका गुजारा कैसे होगा , खुद के खाने के लिए तो मेहनत करनी ही पड़ेगी।  नौकर चाकर का क्या भरोसा अगर भरोसा कर भी लिया जाये तो बच्चे उनका क्या ? ......  अभी सास इसी उधेड़ बुन में थी की लड़के और बहु की आवाजें उसके कानो में गूंजने लगी। 

बहु ने आते ही नए घर की मांग कर दी थी और लड़का अपने माँ - बाप को छोड़ने को तैयार नहीं था उसने साफ़ तौर पर कह दिया की अगर उसे सबके साथ रहना है तो रहे नहीं तो वापस अपने मायके जा सकती है। जिस माँ ने उसे जन्म दिया बचपन से लेकर आज तक बिना स्वार्थ के पालन किया , जिस पिता ने सालो एक ही कपडे में गुजार दिए की उसके बेटे की परवरिश में कोई कमी ना रह जाये उनसे जुदा होने की बात वो सपने में भी नहीं सोच सकता 


माँ को कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ , बहु की हरकते देखकर भविष्य की हरकतों का अंदाजा हो गया था।  बल्कि उसे अपने संस्कार पर गर्व था जो उसने अपने बेटे को दिए थे और साथ ही अपने बेटे पर भी। 
बहु अब तक समझ गई थी की इस घर की बुनियाद जिस संस्कार पर टिकी हुई है वहां उसके नखड़े का कोई स्थान नहीं ....  

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