lahu

 लहू 




लाल हूँ ,लहू हूँ , अछूत नहीं

lahuसड़को पर बहाते हो कभी आजमाते हो
खून हूँ , सुकून  हूँ ,ना बहुँ तो थम  जाते हो                       

बह जाऊ तो डर  जाते हो
बहाते हो तो क्या पाते हो
बहता हूँ पीढ़ी दर पीढ़ी
इसीलिए तो हर पीढ़ी को आजमाते  हो 

लाल हूँ , बवाल नहीं 
ये सबको क्यों नहीं बतलाते हो 
कभी तलवार से कभी बन्दूक से 
लाल के सिवा क्या पाते हो 

एक बून्द बनता हूँ कई लम्हो में एक ही लम्हे में मुझे बहा जाते हो 


हर नस्ल हर कौम में रंग लाल मेरा 
काश कभी आये ,वो भी सवेरा 
चली जाये जाति ,ना रहे तेरा मेरा 

सुर्ख लाल हूँ , सुर्खियों में रहता हूँ 
बंदिशे बहुत है, सबको सहता हूँ 
फिर भी हर बार, यही कहता हूँ 
बिना भेद के हर रगो में बहता हूँ 
लाल हूँ, लाल गुलाब की तरह
खुशबू  ए चमन की तरह
अमन से रहता हूँ 


लाल  हूँ  लहू  हूँ  अछूत  नहीं  .. ... .. .. 


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teri meri kahani

तेरी मेरी कहानी 




तेरी आवाज सुनकर मैं अब थोड़ा जी भी लेता हूँ 
की थोड़ा खा भी लेता हूँ ,थोड़ा पी भी लेता हूँ 

की आँखे थक गई थी ये, तेरा दीदार करने को 
की धड़कन रुक गई थी ये ,तेरा इन्तजार करने को 
मेरी खामोशियाँ अब तो, मेरी नजरे बताती है 
कभी तुझको बुलाती है, कभी मुझको सताती है 

मेरे साँसों में बसने वाले, एक बात  बताते जा 
की रह लेगा तू  मेरे बिन ,बस इतना समझाते जा 

कभी मै तेरा हो जाऊं, कभी तू मेरी बन जाये 
की एक दूजे में खो जाये, कभी वो दिन भी आ जाये 

जुदाई अब ये तुझसे ,सही जाये नहीं मुझसे 
की धड़कन कह रही हमसे, मर जायेंगे हम कसम से 

बंदिशे तोड़ के आ जा 
की तेरा आशिक बुलाता है 
गर रूठी हुई है तो , ये तुझको मनाता है 

बड़ी लम्बी  है ये जिंदगानी 
की बड़ी छोटी सी, अपनी कहानी 
की कहता है अब ये तुझसे, मेरी आँखों का ये पानी 
 राजा बन जाऊ मैं तेरा , बन जाये तू मेरी रानी 
की कहीं अधूरी न रह जाये, ये तेरी मेरी कहानी 


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commenting on castism

हम जातिवादी हो चुके है


आज सुबह ही मुझे एक काम से एक सरकारी विभाग मे जाना पड़ा क्लर्क ने कागज पे निगाह घुमाई और कहा अच्छा तो आप राय साहब है भई आपका काम तो पहले होना चाहिये और उसने मेरा काम जल्दी कर दिया बातचीत मे पता चला की वो भी मेरी जाति से ही सम्बंधित था . यह एक छोटा सा उदाहरण था जिसने बता दिया की जाति क्यों नही जाती .
उत्तर प्रदेश मे समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर पिछड़ी जाती की एक विशेष जाति को विशेष तौर पर लाभ पहुँचाया जाता है . यही कारण है की अन्य जातियों की सरकारी नौकरियो मे हालत उंट के मुंह मे जीरा जैसी हो चुकी थी फिलहाल वर्तमान सरकार तो आम आदमी के लिये विशेष तौर पर बी बी वाइ ( भिखारी बनाओ योजना) लेकर आई है इसके तहत नौकरियों की जांच के नाम पर 2-3 साल निकल जायेंगे फिर कुछ समय तक इस तरह की बातें आती रहेंगी की अमुक नौकरी निकलने वाली है सरकार उसमे बदलाव कर रही है इत्यादि .
कुल मिलाकर जनता को दिलासो के नाम पर बेवकूफ बनाने की परम्परा जारी रहेगी और जनता भी बेवकूफ बनती रहेगी क्योंकि वो जातिवादी हो चुकी है कभी सपा मे अपनी जाति देखकर तो कभी भाजपा और बसपा इत्यादि पार्टीयो मे अपनी जाति देखकर इनकी गलतियो को अनदेखा करती रहेगी .
क्या कभी सोचा है भारत जैसे इस विशाल देश मे पार्टियाँ जाति आधारित क्यों बनती है , क्योंकि हम जातिवादी है हम आपस मे एक दूसरी जातियों को शंका की दृष्टि से देखते है . कुछ तो राजनीति ने जातिवादी बना दिया कुछ हमारे समाज के ठेकेदारो ने अब तो आलम ये है की जातियों मे उच्च पदो पर आसीन लोगो ने अपनी – अपनी जातियों को आगे बढाने का ठेका सा ले रखा है .
कुछ तो करना पड़ेगा इस जाति का वर्ना आने वाली पीढियाँ नफरत और हिंसा के वातावरण के लिये हमे ही जिम्मेदार ठहरायेँगी . और हम दोष देते फिरेंगे इस राजनीति को जिसको इंसानियत का दुश्मन बनाने मे कहीं ना कहीं हम खुद दोषी है .
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bareli ka peda part - 5


bareli ka peda part - 5



बरेली का पेड़ा - 5 (hindi me)



विजय - जी मैडम 
त्रिशा - एक गुजारिश है आपसे 
विजय - बताइये 
त्रिशा - प्लीज आप मुझे मैडम ना कहे 
विजय - क्यों मैडम 
त्रिशा - देखा फिर मैडम 

विजय - नहीं मैडम वो बात ऐसी है की .... 
त्रिशा बीच में ही बात को काटते हुए 
- आपका मैडम कहना ऐसा लगता है जैसे मैं कोई बुढ़िया हो गई हूँ। 
विजय - ऐसी बात नहीं है मैडम 
त्रिशा - देखा फिर मैडम , अगर आपको लगता है की मैं बुड्ढी और खड़ूस हूँ तो आप मुझे मैडम कह सकते है। 
विजय - नहीं ऐसी बात नहीं है आप हमारी कम्पनी की मालकिन है इसीलिए मैं कहता था लेकिन अगर आप की यही इच्छा है तो ठीक है मैं आपको त्रिशा जी कहकर ही बुलाऊंगा। 
त्रिशा - अब हुई न सही बात 

विजय की नजरे झुक जाती है। 

त्रिशा  वेटर को बुलाती है और उसे टमाटर का सूप और गोभी के परांठे लाने को कहती है। 

विजय अचानक ही बोल उठता है - आपको कैसे पता की मुझे गोभी के परांठे पसंद है.
त्रिशा विजय की तरफ अचंभित नेत्रों से देखती है - अच्छा आपको भी गोभी के परांठे पसंद है मैंने तो अपनी पसंद का डिनर मंगवाया था। 

विजय मन ही मन ही मन सोचता है की इस लड़की को तो आज की लड़कियों की  तरह पिज्जा या अन्य विदेशी  व्यंजनों से लगाव होना चाहिए पर इसे तो शुद्ध देशी व्यंजन  ही पसंद है। 

विजय - जी बरेली में मां के हाथो के गोभी के परांठे मुझे हमेशा ही पसंद रहे है। 
त्रिशा - खुशनसीब है आप विजय जी जो आप की माँ आपके साथ है मैं तो बहुत छोटी थी तभी माँ का साथ छूट गया। पापा ने ही उनकी कमी पूरी करने की कोशिश की पर एक माँ की ममता तो एक माँ ही दे सकती है।कहते हुए त्रिशा भाउक हो उठती है। 

विजय त्रिशा को दुखी देख विषय बदलने की कोशिश करता है 

विजय - आप कभी बरेली आई है। 
त्रिशा - नहीं 
विजय - एक बार जरूर आइयेगा परांठे के साथ चिली पनीर भी मिलेंगे। 
त्रिशा  - अच्छा तो जनाब को ये भी पसंद है उसका भी ऑर्डर देते है माँ के हाथो का नहीं तो क्या। 
विजय - अरे त्रिशा जी मैं तो वैसे ही कह रहा था खामख्वाह आपको परेशान होने की जरुरत नहीं है। 
त्रिशा - इसमें परेशान होने की क्या बात है। कम से कम आपने अपनी पसंद तो बताई नहीं तो आप तो करेला खाने को भी तैयार थे। कहते हुए त्रिशा मुस्कुरा देती है और उसे देखकर विजय भी मुस्कुरा देता  है। 

त्रिशा बैरे को बुलाकर चिली पनीर का ऑर्डर भी दे देती है। 

बहुत दिनों बाद किताबो की गहराइयों से निकलकर त्रिशा किसी शख्स के साथ बातें कर रही थी उसे खुद नहीं पता था की जिंदगी और किताबों में कितना अंतर होता है। किताबें पढ़ना तो आसान होता है पर किसी शख्स का चेहरा पढ़ना सबसे मुश्किल। 

विजय का संकोची स्वभाव और मासूमियत  ने कही न कही अपना काम करना शुरू कर दिया था। त्रिशा भी अभी इस बात से अनजान थी। और विजय भी इससे बेखबर था। 


वेटर भोजन लेकर आता है और दोनों खाना शुरू करते है। 

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bareli ka peda part - 4

बरेली का पेड़ा  - 4 bareli ka peda in hindi



पूर्णिमा की वो रात जिसमे निकला था एक चाँद  विजय को आज भी है याद

ठण्ड की रातें वाकई बहुत सुहानी हो जाती है जब वो कही दूर वादियों में गुजरती है।  विजय पहली बार किसी आलिशान होटल में रात्रिभोज करने वाला था मुंबई में तो अक्सर सड़क किनारे लगने वाले ठेलो से ही उसका काम चल जाता था , यहीं आकर उसने पावभाजी का स्वाद लिया जिसे मुंबई जैसे शहर में गरीबो का भोजन कहा जाता है। बरेली में बने अपने घर के खाने की याद विजय को हमेशा ही आती थी , मां के हाथो के बने गोभी के परांठे और चिली पनीर की सब्जी विजय के पसंदीदा व्यंजन है। गोभी के परांठो का तो विजय इतना शौकीन था की गर्मी के दिनों में भी कही न कहीं से गोभी  ढूंढ लाया करता था।


त्रिशा तैयार होकर होटल के रेस्टोरेंट में पहुँचती है ,वहाँ विजय पहले से ही उसका इन्तजार कर रहा होता है .त्रिशा को देखते ही वह सन्न रह जाता है वजह आज त्रिशा  आसमान से उतरी  किसी परी सरीखी लग रही थी वैसे तो त्रिशा सादगी वाले ही वस्त्र जैसे सलवार सूट ही पहनती थी। परन्तु आज उसने साड़ी पहनी थी।
काले  रंग की साडी ऊपर से खुले बाल और बिना किसी मेकअप के साक्षात् सुंदरता की देवी लग रही थी , विजय तो  उसे देखते ही रह गया। 

त्रिशा - क्या मैनेजर साहब आप तो आज बहुत ही स्मार्ट लग रहे है। 
विजय (थोड़ा शर्माते हुए) - नहीं मैडम आप तो स्वयं  किसी राजकुमारी से  कम नहीं लग रही है.
त्रिशा (मुस्कुराते हुए )- अच्छा जी , तारीफ़ करना तो कोई आपसे सीखे। 

 अब विजय क्या बताता की वाकई त्रिशा कितनी खूबसूरत लग रही  थी। अगर वो उसकी मालकिन नहीं होती फिर तो वो उसकी खूबसूरती का विस्तार  से वर्णन करता ,परन्तु वो भी अपने  कद को पहचानता था इसीलिए उसने बात को वही विश्राम दिया। पर त्रिशा तो आज जैसे विजय को परेशान करने के मूड थी। 

त्रिशा - बताइये मैनेजर साहब क्या खाएंगे आप। 

विजय - जो आपकी मर्जी मैडम। 

त्रिशा - फिर तो आज हम करेले के सूप से शुरुआत करते है (ऐसा कहते हुए वो विजय का चेहरे  वाले भाव को देखने लगती है )
विजय - थोड़ा सकुचाते हुए कहता है "जी मैडम " 
विजय को करेले से सख्त नफरत थी  उसका मानना था की  करेले जैसी कड़वी चीज सब्जी कहलाने लायक भी  नहीं है।यही सोचते हुए की आज तो वो बुरी तरह फस गया उसका चेहरा किसी बच्चे की तरह लगने लगा था। उसके मासूम चेहरे पर आने वाले भावो को देखकर त्रिशा खिलखिला के हस पड़ती है। लेकिन वो अभी विजय को किसी तरह की राहत देने के मूड में नहीं थी। 

विजय - क्या हुआ मैडम 
त्रिशा (हँसते हुए )- कुछ नहीं विजय जी करेला तो मुझे पसंद नहीं है , वो तो मैंने आपके लिए मंगवाया है ,मैं टमाटर के सूप से ही काम चला लूंगी। 

अब तो विजय का मासूम चेहरा नारियल के छिलके की तरह उतर चुका था। बड़ी मुश्किल  अपने चेहरे के भावो को छुपाते हुए वह कहता है की। 

-  मैडम मैं सोच रहा था की मैं भी टमाटर के सूप से ही शुरुआत करू क्या है की ठंड के मौसम में मुझे करेला सूट नहीं करता। गर्मी की सब्जी गर्मी में ही खाई जाये तो सेहत के लिए अच्छा रहता है।  

त्रिशा को खेती किसानी के बारे में रत्ती भर भी जानकारी नहीं थी उसे नहीं पता था की करेला गर्मी के मौसम की सब्जी है। अपनी हार होती देख वो कहती है   -    ठीक है हम दोनों ही टमाटर का सूप मंगाते है। 
क्रमश :...... 

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the burning city

जलता शहर  - jalta shahar


ये तेरे शहर मे उठता धुंआ सा क्यो है
यहाँ हर शक्स को हुआ क्या है
बह रही है खून की नदियाँ यहाँ
जाने वो कहता खुद को खुदा कहा है

हर हाथ मे खंजर
और वो खौफनाक मंजर
दिलो को दिलो से जोड़े
ना जाने वो दुआ कहा है

ना तू हिन्दू ना में मुस्लिम
फर्क बता दे लहू मे जो
उन जालिमो का काफिला कहाँ है

सब खेल है सियासतदारो का
और उनके वफ़ादारो का
हम और तुम तो शतरंज के प्यादे है
अभी और खतरनाक उनके इरादे है

अभी तो शुरु हुआ खेल है देखो
आगे किस किस का होता मेल है देखो
गाँव से लेकर शहर तक दिलो मे पीर है देखो
कभी जाति कभी आरक्षण कभी मजहब और धर्म के चलते तीर है देखो

आज बहा लो खून है जितना चाहे
छीन लो सुकून तुम जितना
वही लहू निकलेगा एक दिन अश्क़ो से तुम्हारे
वही सुकून तुम भी चाहोगे
पर कोई ना होगा पास तुम्हारे
जब तक सियासतदारो को पहचानोगे
जब तक इस खेल को जानोगे .. जब तक इस खेल को जानोगे.

ये तेरे शहर मे उठता धुंआ सा क्यो है ..........



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राजनीति पे कविता

barely ka peda part - 3



बरेली का पेड़ा  - 3 bareli ka peda



कहते है की  इंसान की अच्छाई उसके कार्यो  से परिलक्षित होती है और अच्छे इंसानो मांग हर जगह रहती है। 
बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा भर पेट भोजन हो जाने के बाद विजय उसे लेकर अपने साथ बाहर निकलता है वह सोचने लगता है की अभी तो मैंने इसकी मदद कर दी परन्तु इनका प्रतिदिन का गुजारा कैसे होगा विजय को विचारमग्न देख त्रिशा उससे पूछ बैठती है :

त्रिशा - "क्या सोच रहे है मैनेजर साहब  "
विजय -जी  कुछ नहीं मैडम 
 त्रिशा ( बुजुर्ग की तरफ इशारा करके बोलती  है की)  -  मैं सोच रही थी क्यों न इनकी काबिलियत के अनुसार इनको अपनी कोल्हापुर वाली फ़ैक्ट्री में कुछ हल्का सा काम दे दिया जाये जिससे की इनके दैनिक दिनचर्या का काम पूरा हो सके। 

विजय जिस बात को लेकर चिंता कर रहा था उसका समाधान इतनी आसानी से मिल जायेगा उसने सोचा भी नहीं था।  उसने मैडम का शुक्रिया अदा किया और बुजुर्ग से इस सिलसिले में बात करने को मुखातिब हुआ बुजुर्ग भी उनकी बाते सुन रहा था और उसके मन में  कही न कही उन दोनों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी इसलिए वो उनके साथ चलने के लिए तैयार हो गया। 

विजय  -  मैडम मुझे तो मालूम भी नहीं था की आपका ह्रदय इतना विशाल है सत्य ही है आप अठावले जी जैसे महान इंसान की संस्कारवान पुत्री है। 

त्रिशा - नहीं मैनेजर साहब, गुण तो आपके अंदर भरे हुए है मुझे लगा आप भी आज की पीढ़ी की तरह ही व्यावसायिक रुख अख्तियार करते होंगे परन्तु आप के अंदर मानवता जैसे गुणों का समावेश भी है ये आज जानने को मिला। 

विजय - नहीं मैडम मैं तो एक अदना सा इंसान हूँ जिसे आपके पिता जी ने तराश के इस काबिल बनाया की वो भी समाज के लिए कुछ कर सके। 

त्रिशा , विजय की शैली से काफी प्रभावित होती है और  फिर वापस गाड़ी में बैठकर सभी  सफर के लिए निकल पड़ते है  .
विजय सोचता है की विदेश में रहकर भी इस लड़की के अंदर भारतीय संस्कार इस कदर भरे  हुए है और एक वे लड़किया है जो भारत में रहकर भी विदेशी संस्कृति को अपनाने में विशेष रूचि दिखाती है। भारतीय संस्कृति आज भारत से निकलकर विदेशो तक में फ़ैल रही है और लोगो को एक सुव्यवस्थित जीवनशैली प्रदान कर रही है वही पाश्चात्य संस्कृति अपनों से ही अपनों को दूर करने में लगी है स्त्रियों के लिए परिवार का अर्थ स्वयं के पति तक रह गया है।  रिश्तो की डोर कही न कही टूट रही है  और नए स्वार्थवादी रिश्तो का जन्म हो रहा है। जिससे मनुष्य सबकुछ होने के बावजूद अंदर से खोखला होते जा रहा है। 

ठण्ड के मौसम में गाड़ी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती है रास्ते में ही विजय बुजुर्ग से उनका नाम और पता पूछता है उसे ताज्जुब होता है ये जानकर की ये मामूली सा दिखने वाला आदमी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रह चुका है जिसके दोनों लड़को ने उसे घर से निकाल दिया और सारे पैसे तथा संपत्ति पर अपना अधिकार कर बैठे।सरकार की तरफ से मिलने वाली पेंशन भी अभी कार्यालयों के चक्कर काट रही है। अभी वह और कुछ जानता  तब तक त्रिशा उसे बहार का मनोहारी दृश्य देखने को कहती है  सूरज भी अब ढलने ही  वाला था  की  वे कोल्हापुर में प्रवेश करते है।  गाड़ी एक शानदार होटल में जाकर रूकती है  जहा पहले से ही सबके कमरे आरक्षित  रहते है।

ड्राइवर और भीकू सामान उतारते है और बाकि लोग रिसेप्शन की ओर आगे बढ़ते है।सबके कमरे तो आरक्षित थे सिवा उन बुजुर्ग के इसलिए विजय उनको अपने कमरे में साथ ले गया।त्रिशा रात में भोजन साथ में करने की बात कहकर अपने कमरे में विश्राम करने चली गई। क्योंकि अभी तो वो रात बाकि थी जहाँ से  कहानी एक नया मोड़ लेने वाली थी। 

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बरेली का पेड़ा - 4 

पिछली कड़िया - 

बरेली का पेड़ा -2 

बरेली का पेड़ा -1 

  

reservation mistake of constitution

आरक्षण- संविधान की सबसे बड़ी भूल



reservation mistake of constitution

इधर बहुत दिनो से अनेक सरकारी परीक्षाओ मे फेल होते होते मन मे एक खिन्नता सी आ गई थी . लेकिन इस बात का विश्वास की अगली बार या एक बार भी परीक्षा मे पास हो गये तो आने वाली जिंदगी सुकून से निकल जायेगी और सारे दुख दर्द दूर हो जायेंगे एक परीक्षा और दे आते है . वैसे तो हम जाती को नही मानते लेकिन अलग अलग जातियों की जारी होने वाली कट – ऑफ लिस्ट और उनका अंतर कहीं ना कहीं जाति  व्यवस्था को लेकर समाज की और सरकार की मान्यता दर्शाता है क्या जनरल वालो के दिमाग मे अलग से कोई कम्प्यूटर की तरह् प्रोसेसर लगा होता है जिससे वी यदि 200 अंको की परीक्षा मे 189 लाये तो उनका सेलेक्शन अमुक परीक्षा के लिये होगा और पिछड़ी जाति का विद्यार्थी 150 और अति पिछड़ी जाति  का 100 नंबर लाने पर ही अपनी सीट सुरक्षित कर लेता है क्या इसको लेकर अन्य जातियो मे वैमनस्य नही उत्पन्न होता .
यदि यह मान्यता सही है तो क्या मायावती जैसी नेता के पास दिमाग की कमी है क्या अखिलेश यादव द्वारा चुनाव लड़ने पर 50000 वोट स्वतः ही बढ़ा देना चाहिये क्योंकि वो पिछड़ी जाती से है . यानी हमारा संविधान मानता है की अखंड भारत मे दिमाग के अनुसार लोगो का बंटवारा किया जाता है . संविधान मे यदि आरक्षण लागू है तो में साफ कहना चाहूंगा की उसका फार्मूला ही गलत है . में नही मानता ऐसे संविधान को जिसने आज जाती व्यवस्था को इतना बढ़ावा दे दिया की इंसान स्वार्थ हेतु एक दूसरे को मारने काटने पर उतारू है जहा पिछडेपन का करण आर्थिक स्थिति ना होकर मानसिक स्थिति है . हम खुद ही जातियो को हंसी का पात्र बनाते जा रहे है और उस वर्ग मे कुंठा को उपजा रहे है जो दिन रात मेहनत करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करता है .
अब कुछ लोग कह सकते है की संविधान ने तो इसे 10 साल के लिये है लागू किया था पर राजनीतिक पार्टीयो ने वोट बैंक की राजनीति के लिये इसे आजतक जारी रखा तो इसमे भी कही ना कही संविधान की ही खामी है संविधान सभा मे जहा प्रत्येक कानून के निर्माण के समय उसकी विसंगतियो और भविष्य मे होने वाले दुरुपयोग पर विचार किया गया वही इस पर भी अवश्य विचार करना चाहिये था की राजनीतिक दल अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु कुछ भी कर सकते है . 
अगर लाभ के लिये आरक्षण हेतु दंगो पर उतारू हुआ जा सकता है अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या करके दंगे भडकाया जा सकता है तो मेरा सरकार से अनुरोध है की कृपया करके इनपर कारवाई ना की जाये क्योंकि हमारा संविधान भी मानता है की भारत मे कई जातिया ऐसी है जिनके पास दिमाग की कमी है हो सके इसी कमी की वजह से उनसे कुछ गलती हो गई हो . अगर उनके पास दिमाग की कमी नही होती तो आरक्षण हटाने का पहला प्रस्ताव उन्ही की तरफ से आता की इसे खत्म किया जाये हम किसी से कम नही है और आरक्षण और जाति को लेकर इस देश मे कोई राजनीति ना हो अगर करनी ही है तो केवल विकास और की राजनीति हो रोजगार की राजनीति हो शान्ती की राजनीति हो अहिंसा की राजनीति हो परंतु यह तभी संभव है जब हम तर्क के साथ सवाल पूछना शुरु करते है जब प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारो के प्रति जागरूक हो जब इस देश मे शिक्षा का स्तर नकल से अकल के लिये जाना जाये जब नाली से लेकर संसद मे दी जाने वाली गाली का हिसाब लिया जाये . जय हिन्द …

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बरेली का पेड़ा - 2 


बरेली जैसे छोटे शहर का लड़का विजय  अभी मुंबई जैसे महानगर में खुद को अकेला ही समझता था , उसके  मौसेरे भाई और विजय के  ऑफिस का  समय  अलग - अलग होने की वजह से उनकी मुलाकात छुट्टी के दिन ही होती थी। विजय की कम्पनी की एक फ़ैक्ट्री मुंबई से दूर कोल्हापुर के पास स्थित थी काफी पुरानी  होने के कारण उसमे पुनःनिर्माण का कार्य प्रारम्भ होना था कंपनी की शुरुआत भी इसी फ़ैक्ट्री से हुई थी यही वजह थी की त्रिशा भी इस फ़ैक्ट्री को देखना चाहती थी जिसकी नींव उसके परदादा ने रखी थी। पुनःनिर्माण के कार्य हेतु विजय को चुना गया क्योंकि मालिक गुणवत्ता से किसी तरह का समझौता नहीं चाहते थे। उधर त्रिशा भी सड़क के रास्ते ही कोल्हापुर तक जाना चाहती थी जिससे वह रास्ते की खूबसूरती देख सके और अलग - अलग तरह के लोगो से भी मिल सके।
मालिक श्री हरगोविंद अठावले एक बहुत ही सुलझे हुए समझदार इंसान थे तथा वे विजय पर पूर्ण विश्वास करते थे इसलिए उन्होंने विजय और त्रिशा को एक साथ भेजने का फैसला किया और साथ में घरेलु नौकर भीकू और ड्राइवर हीराभाई जो की अठावले जी का विश्वास पात्र था  ।

 कितनी खूबसूरत है ये दुनिया हरे भरे रास्ते ऊँची ऊँची  पहाड़िया  यात्रा शुरू हो चुकी थी और विजय रास्ते की खूबसूरती देख कर विचार में मग्न था उसने आजतक कल्पना नहीं की थी की कभी उसकी जिंदगी में इस तरह के दिन भी आएंगे  लेकिन उसे क्या पता की नसीब अभी उसे और कहा लेकर जाने वाला है। त्रिशा भी कई साल बाद पढाई से फुर्सत पाकर सफर पर निकली थी अमेरिकी जीवन शैली उसे कतई  नहीं पसंद थी  वो तो बस यही सोचा करती थी की कब उसे वापस अपने घर जाने को मिलेगा।  खैर रास्ता वाकई बहुत खूबसूरत था।  कुछ घंटो  के सफर के बाद गाडी एक होटल पर रूकती है व सभी लोग चाय नाश्ता करते है होटल के बाहर गेट पर एक बुजुर्ग अत्यंत ही दीन  अवस्था में पड़ा हुआ था व आने जाने वाले लोगो से भोजन हेतु भीख मांग रहा था होटल के कर्मचारियों द्वारा भगाये जाने के बाद भी वह बार - बार वापस आ जा रहा था।  विजय के पास जाने पर वह कहता है की 
- साहब गरीब को रोटी के लिए कुछ दे दो भगवान् आपके बाल बच्चो को दुआएं देगा 
 पता नहीं उस बुजुर्ग को देखकर विजय को ऐसा अहसास हुआ की उसका  उससे कोई ना कोई रिश्ता जरूर है चाहे वह पिछले जन्म का ही क्यों न हो 
 विजय गाडी में जाता है और अपने बैग में से कुछ कपडे निकालकर उस बुजुर्ग को अपने हाथो से पहनाता हैं उसके बाद उसे लेकर होटल में जाता है और बुजुर्ग की पसंद का खाना मंगवाता है  खाना आने पर वृद्ध व्यक्ति उस पर ऐसे टूट पड़ता है जैसे कई दिनों की भूख आज शांत करके रहेगा। 
विजय का ह्रदय द्रवित हो उठता है और आँखे भर आती है। दूर खड़ी त्रिशा यह सब देखती है और उसके मन में विजय के लिए सम्मान की भावना आती है। वह सोचती है की उसने तो आजतक ऐसे ही लोगो को देखा है जो सीधे मुंह अपने से छोटे लोगो से बात भी नहीं करते गरीब और निर्धन लोगो की बस्तियों में नहीं जाते भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखते है ऐसे में विजय के अंदर उसे वो इंसानियत दिखती है जो आज के कलियुग में विलुप्त हो चली है। .. शेष क्रमश


प्रथम भाग - 

बरेली का पेड़ा -१ 




congress family and country

कांग्रेस, परिवारवाद और देश


congress family and country


देश की सबसे बड़ी राष्‍ट्रीय पार्टीयो मे से एक कांग्रेस आज एक बार फिर अपने बुरे दौर से गुजर रही है . कांग्रेस पार्टी और उसके आलाकमान को आवश्यकता है की एक बार फिर से अपनी सम्पूर्ण राजनीतिक गतिविधियो की निस्पक्ष रूप से समीक्षा करे और कुछ बेहतरीन चेहरो को महत्वपूर्ण जिम्मेदारिया देकर आगे करे .
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह है की वह एक परिवार विशेष तक सिमट कर रह गई है और अपने राजनीतिक स्वार्थ हेतु पार्टी मे किसी के अंदर इतनी हिमाकत नही है की वह इस बात को स्वीकार करे और परिवार का बर्चस्व पार्टी से समाप्त करे . एक अच्छी सरकार के साथ एक मजबूत विपक्ष का होना भी आवश्यक है जिससे सरकार से संसद से लेकर सड़क तक मजबूती से सवाल किया जा सके . परंतु कहते है न सत्ता का नशा ऐसा है जिसके आगे सारे नशे फेल हो जाते है . वैसा ही नशा विदेश से आई एक महिला के अंदर भी समाहित हो चुका है जिसकी परिणिती आज कांग्रेस पार्टी भुगत रही है .
यदि आप वास्तव मे एक ऐसे देश का भला चाहते है जिसने आपको स्वीकार करते हुए देश को आगे ले जाने का मौका दिया है तो आप का फर्ज है की वास्तविकता को समझते हुए देशहित मे कार्य करे . अगर आप ऐसा नही करते तो कही ना कही आपकी महत्वाकांक्षा सामने आती है .पर्दे के पीछे से सत्ता नियंत्रण वही करते है जो जनता के प्रति जिम्मेदार नही होते और अपनी लूट खसोट की नीति को आगे बढ़ाते  है.  आज सरकार मे कुछ भी घटित होने पर जिस प्रकार मोदी को जिम्मेदार ठहराया जाता है संप्रग शासन काल मे पहला निशाना मनमोहन सिंह की चुप्पी होती थी परंतु उस चुप्पी के पीछे की वजह बताने कोई आगे नही आता था .

2014 का परिणाम उसी चुप्पी का नतीजा है जिसका खामियाजा आज भी कांग्रेस भुगत रही है . कांग्रेस आज केवल सरकार  की कमजोरी और सत्ता विरोधी लहर के सपने देख रही है जिसके बूते वो अपनी वापसी कर सके नाकी अपने नेतृत्व के भरोसे आज उसे छोटी - छोटी क्षेत्रीय पार्टीयो का पिछ्ल्गु बनने मे भी गुरेज नही है . सोनिया गाँधी ने सरकार को कठपुतली की तरह नचाया और सत्ता बरकरार रखने के लिये देश की साख से भी खिलवाड़ किया उसी का परिणाम है की जनता कांग्रेस को विपक्ष के रूप मे भी नही देखना चाहती . उपचुनावो मे भी कांग्रेस आज अपनी जमानत नही बचा पा रही है . आखिर बाप दादा के नाम पर देश कब तक कांग्रेस को ढोती रहेगी . कांग्रेस की चर्चा होने पर अक्सर ही इंदिरा से लेकर राजीव ,नेहरू का जिक्र होता है क्या भविष्य मे जनता सोनिया या राहुल का जिक्र भी उसी अनुसार करेगी .
कांग्रेस मे आज भी नेताओ की कमी नही है परंतु नेहरू काल से ही विकसित वफादारी की परम्परा आजतक कायम है . कांग्रेसी नेताओ को समझना चाहिये की वफादारी पार्टी से और देश की जनता के प्रति होनी चाहिये ना की परिवार से . आज अगर उन्होने थोड़ी सी भी वफादारी देश के प्रति दिखाई होती तो जनता एक बार उनके विषय मे अवश्य ही  चिंतन करती . परंतु आज यदि कांग्रेस अपने हर बात मे अतीत का जिक्र करना छोड़ दे और वर्तमान के मुद्दो को लेकर चले तो भ्रस्टाचार से लेकर तुष्टिकरण तक की नीति मे उसके पास कोई जवाब नही रह जाता . बांटो और राज करो की नीति से जिस पार्टी की शुरुआत हुई थी वह आज उसी को लेकर भाजपा पर इल्जाम लगाती दिख रही है आखिर कांग्रेस ने कुछ तो ऐसा जरूर किया होगा जिसकी वजह से विश्व के सबसे बड़े हिन्दू राष्ट्र का हिन्दू भी उससे कतराने लगा है . आज राहुल गाँधी मंदिरो के चक्कर लगाने पे मजबूर है आखिर किसी ना किसी प्रकार का सर्वे उनके पास जरूर आया होगा जिससे वे  ऐसा करने पर मजबूर है .


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कहते है परिंदे के लिए सारा आकाश ही उसका घर होता है  वह कही भी स्थाई तौर  पर अपना घोंसला नहीं बनाते । आज इस डाल कल उस डाल, विजय  भी इन परिंदो को देखकर सोचा करता था की कितने  खुशनसीब होते है ये ना  इन्हे  सरहदों की फ़िक्र ना  इन्हे आशियाने  की चिंता। आम समस्याये इनकी जिंदगी में होती होगी तो क्या होती होंगी ?
एक हमारी जिंदगी है जिसमे हम उन्मुक्त होकर अपनी उड़ान भी नहीं भर सकते।  आधुनिकतावाद  और धन की लालसा   हमारी जिंदगी में सिवाय तनाव के हमें दे ही क्या रही है। जिम्मेदारियों के बोझ तले इंसान इतना दब  चुका है की उसे अपने विषय में सोचने तक की फुर्सत नहीं है  सच ही कहा गया है  की  " तुम्हे गैरो से कब फुर्सत हम अपने गम से कब खाली चलो हो चुका मिलना ना तुम खाली ना हम खाली " . 

कुछ इन्ही विचारो के साथ मुंबई जैसे नए शहर में विजय का  आगमन होता है , कहते है मुंबई एक ऐसी मायानगरी है जिसमे इंसान यदि एक बार आ गया तो फिर फसते ही जाता है। विजय छोटे से शहर बरेली का रहने वाला है और घर की जिम्मेदारियों को निभाते निभाते यहाँ तक चला आया है , यहाँ उसका मौसेरा भाई किसी कंपनी में काम करता है  और उसी ने विजय को काम दिलाने के लिए इस शहर में बुलाया है , छोटे शहरो में रोजगार न होना एक गंभीर समस्या का रूप लेते जा रही है जिससे इन शहरो में रहने वाले लोग पलायन के लिए मजबूर है। अनेक प्रकार से प्रयास करने के बाद जब विजय ने देखा की इस छोटे से शहर में उसकी शिक्षा के अनुसार कोई भी कार्य नहीं है और घर पर बूढ़े माँ - बाप और दो छोटी बहनो की जिम्मेदारियां उसी के सर पर है तो उसने पलायन करना ही उचित समझा।  


घर से विदा लेते समय उसकी आँखे  भर आई थी जीवन में पहली बार उसे अपने परिवार से अलग होना पड़  रहा था  माता - पिता की आँखे भी अपने इकलौते पुत्र हेतु लगातार गंगा की धारा की तरह बहे जा रही थी। मुंबई आने के बाद विजय के मौसेरे भाई ने उसे एक कंपनी में क्लर्क की नौकरी दिलवा दी। विजय प्रतिदिन ऑफिस के समय से एक घंटा पूर्व ही पहुँच जाता था और दिन भर  पूरी निष्ठा से काम किया करता था। एक बार उसने कंपनी में होने वाले हेर - फेर को कागजो में पहचानकर उसकी शिकायत कंपनी के मालिकों से कर दी , यह हेर - फेर कंपनी के मैनेजर और बड़े बाबू की सांठ - गाँठ से कई वर्षो से किया जा रहा था।  विजय कामर्स का  छात्र था और उसने एम् काम  में रुहेलखंड विश्वविद्यालय टॉप किया था। पहले तो पता चलने पर मैनेजर और बड़े बाबू ने उसे अनेक प्रकार से डराने की कोशिशे की व उसे नौकरी से निकलने की धमकी भी दी लेकिन विजय कहा किसी से डरने वाला था उसपर तो ईमानदारी का नशा सवार था  अंत में सारे दांव विफल होते देख विजय को धन का प्रलोभन भी दिया गया परन्तु नमक हरामी विजय के खून में आ जाये मुमकिन ही नहीं।  विजय की ईमानदारी से प्रभावित होकर मालिकों ने विजय को कंपनी का मैनेजर बना दिया। 

मैनेजर बनने के फलस्वरूप विजय ने जल्द ही अपनी दोनों बहनो की शादी एक अच्छे खानदान में कर दी व माता - पिता की सेवा के लिए एक नौकर रख दिया। विजय की ईमानदारी से उसके मालिक काफी प्रसन्न रहते थे व जल्द ही विजय उनका विश्वास पात्र बन गया।   विजय आज भी उसी सादगी से रहता था जैसा की वह गांव से आया था हाँ पर बातचीत के लहजे में कुछ मुम्बइया झलक आ गई थी।  मालिक की इकलौती  बेटी अमेरिका से पढाई पूरी करने के बाद वापिस मुंबई आती है नाम था त्रिशा।  वैसे तो त्रिशा विलायत में रही थी पर सिवा ज्ञान के वह वहां से भारत में कुछ भी लेकर नहीं आई थी। अमेरिका और उसकी संस्कृति उसे बिलकुल पसंद नहीं थी  परन्तु शिक्षा के लिए वह कही भी जा सकती थी। पढाई से उसे बेहद लगाव था अक्सर उसका समय मोटी - मोटी किताबों में ही बीतता था। इंडिया आने के बाद खाली समय में वह कभी कभी ऑफिस चली जाया करती थी। विजय से उसकी मुलाकात एक मालिक और मुलाजिम के रूप में ही हुई थी , विजय लड़कियों के मामले में बहुत ही शर्मीला और संकोची था इसलिए वह जल्दी त्रिशा के सामने नहीं जाता था। लेकिन एक दिन ऐसा कुछ हुआ की विजय को पुरे दो दिन त्रिशा के साथ रहना पड़ा और उसकी जिंदगी ने एक नया रूप लेना शुरू किया। शेष अगले अंश में। .. 



choti see bat

भाजपा को  लेकर छोटी सी बात- 


 मुझे आजतक नही पता था की देश मे मोदी भक्त कितने है लेकिन अगर उनकी संख्या 18 करोड़ है तो में इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ की 2019 मे ये 18 करोड़ देशभक्त सिर्फ अपनी श्रीमतीजी का वोट ही भाजपा को दिला दे तो सरकार एक बार फिर भक्तो की ही रहेगी . 

बोफोर्स घोटाले मे ही तोता(सीबीआई ) द्वारा लन्दन की अदालत मे कहा गया की क्वात्रोची के खिलाफ  कोई सबूत नही है कोर्ट द्वारा खाता सील किये जाने से पूर्व ही पूरा पैसा निकल लिया गया अब क्वात्रोची के बारे मे पूरी जानकारी कही भी मिल जायेगी. उस समय सीबीआइ प्रमुख जोगिन्दर सिंह ने अपने उपर पड़ने वाले दबाव का जिक्र विस्तार से अपनी किताब मे किया है क्वात्रोची को बचाने  के लिये ही राजीव गाँधी ने अपने प्रिय मित्र अमिताभ बच्चन को फंसाया था इसका भी खुलासा कुछ दिन पूर्व ही उस समय स्वीडिश जांच एजेन्सी के प्रमुख ने किया था . 2जी स्पेक्ट्रम यदि घोटाला नही रहता तो सुप्रीम कोर्ट ए राजा को इतने दिन तक जेल मे सब्जी उगाने का काम नही देती और नाही राजग के समय होने वाली  स्पेक्ट्रम आवंटन मे उतना पैसा मिलता जितना विनोद राय  द्वारा कहा गया . उस समय की जांच को कांग्रेस द्वारा ही प्रभावित किया गया और कॉल आवंटन से सम्बंधित कई फाईले आग के हवाले की गई .   


कर्नाटक चुनावो मे यदि जनता को लगता है की वहा से बीजेपी प्रत्याशी भ्रष्ट है तो उसका जवाब वो इन चुनावो मे जरूर देगी .रही बात कश्मीर समस्या की जोकि कांग्रेस के परदादा की देन  है  तो वहा जिससे भी गठबंधन हो परंतु अलगाववादियो और आतंकवादियो पर आई शामत और सेना को मिली छूट जो की पत्थरबाजो  को आज जीप की बोनट पर घुमा रही खुद ही इसकी गवाही देते है . म्यानामार  की सीमा मे हम घुस कर आतंकवादियो से बदला लेते है , त्रिपुरा मे इसी कांग्रेस ने अपनी देशभक्ति का सबूत देते हुए आजतक तिरंगा नही लहराने दिया वहा आज शान से हम इसे सलामी देते है . आज आम आदमी को 1 रुपया पर बीमा उपलब्ध है स्वास्थ के लिए सस्ती दर पर बीमा उपलब्ध है . किसानो का कर्ज़ माफ होता है  पहली बार किसी सरकार ने कम से कम उनकी आय दूनी करने के बारे मे सोची तो वर्ना कांग्रेस वाले सिर्फ जीजा जी की आय बढाने के बारे मे ही सोचते थे उन्ही जीजा जी पर भाजपा सरकार ने 18 मामलो मे सीबीआइ जांच बैठा रखी है थोड़ा तो इंतजार कीजिये नही तो जीजा जी जेल चले गये तो सासु मां की तबियत वैसे ही खराब चल रही है . इतने भी निर्दयी नही है भाजपा वाले .

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