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love and politics

प्यार और सियासत 




कल ही देखा था उसको ....हरी साड़ी पहनकर बजार मे गोलगप्पे खाते हुए ..
अभी पिछले बरस की ही बात है जब वो हमारे पड़ोस मे दो मकान छोड़ मिश्रा जी के घर किरायेदार बनकर आई थी , उसके साथ उसका पूरा कुनबा था जिसके मुखिया उसके पिता जी थे जो की शहर मे दरोगा थे.
परिवार मे मां के अलावा एक छोटी बहन और दो बड़े भाई भी थे , भाइयो मे एक की शादी हो चुकी थी और भाभी की गोद मे एक साल भर की लड़की थी नाम था अर्पिता .
गोलगप्पा खाने के दौरान ही उसने मुझे देख लिया था पर देखकर अनदेखा करना शायद नियती की मजबूरी थी ऐसी मजबूरी जिसे पति कहते है जो की उसके साथ मे ही खड़ा था . गोलगाप्पे का स्वाद जो भी हो पर इस मुलाकात ने उन यादों और उन जख्मो को हरा कर दिया था जो वक़्त ने दिये थे .

नये किरायेदार के बारे मे उत्सुकता तब और बढ जाती है जब परिवार की कोई सदस्या अपनी खूबसूरती की छाप आते ही छोड़ देती है , मुहल्लो के लौंडो के बीच चर्चा का विषय राजनीति से बदलकर अचानक ही प्रेमनीति हो जाती है और जिन्होने आजतक प्रेम का ककहरा भी ना सीखा हो वे अपने ज्ञान का प्रदर्शन ऐसे करते है जैसे प्रेमशास्त्र की रचना उन्ही के द्वारा की गई हो .....उसपर से आजकल के नये लौंडे जिनके सिर् पर चारो तरफ रेगिस्तान नजर आता है और बीच मे कपास की फसल उनकी शुरुआत प्रेमशास्त्र के आखिरी पन्ने से होते हुये सीधे रिज़ल्ट तक पहुंच जाती है


मुझे कभी भी अपने मुहल्ले की इस तरह के समुदाय पसंद नही आए थे , मेरी दिनचर्या सीधा यूनिवर्सिटी से घर और घर से यूनिवर्सिटी बस यहीं तक सीमित थी . बीच मे मित्र आसिफ़ के घर पर जरूर कुछ ज्ञान की बाते हो जाया करती थी .
उसका पति पुलिस विभाग मे ही कांस्टेबल था . तथा उसके पिता जी उसके सीनियर हुआ करते थे . मुहल्ले मे अब बात के अलावा आगे की रणनीति पर विचार किया जाने लगा पहली छोटी सी समस्या उसके बाप के आगे सिर् झुकाने की थी जिससे आगे का पथ सुलभ हो जाता.

पर समस्या यह थी की आखिर बिल्ली के गले मे घंटी बांधेगा कौन . शाम के समय अक्सर ही चर्चा करते करते देर हो जाया करती थी ऐसे ही एक शाम मे पैदल ही आसिफ़ के घर से लौट रहा था तभी रास्ते मे लोगो का झुंड एक आदमी को दौड़ाते हुए चला आ रहा था भीड़ के पास आने पर पता चला की वो कोई पत्रकार था जिसने किसी समुदाय विशेष के खिलाफ अपने अखबार मे कुछ लिख दिया था इससे पहले की भीड़ एक ग़ली के घुमावदार रास्ते मे घूमति मैने उस पत्रकार को इशारे से एक घर के अंदर जाने को कहा . वो घर आसिफ़ का था .गजब का खून सवार था उस भीड़ पर जैसे कानून नाम की वस्तु उनके लिये कोई मायने नही रखती उसमे से कुछ लडको को में जानता था जो की पैसे के लिये कुछ भी करने को तैयार रहते थे , उनका सारे राजनीतिक दलो के साथ उतना बैठना था , खैर भीड़ अपने मंसूबो मे नाकाम रही और उसके हाने के बाद मैने पत्रकार जी से पूरी जानकारी ली , पता चला की उनके लेख मे कुछ ऐसा नही था जिससे तनाव का बीज अंकुरित होता , वे  मेरे साथ ही थाने गये और उन्होने पुलिस को सारी बात बताई वही मेरी मुलाकात शेखर अंकल से हुई .... यही नाम था उसके पिता जी का उनसे मिलने पर पता चला की पुलिस मे होते हुए भी उनके अंदर कितनी सौम्यता थी बस उनका चेहरा ही अमरीश पुरी की तरह था पर दिल अंदर से एकदम मुलायम . यही से उनके घर आने जाने का सिलसिला चालू हो गया जिसने धीरे - धीरे  परिवारिक मित्रता का रूप ले लिया . और यही से उससे पहली मुलाकात हुई ....झुकी नजरे, सरल स्वभाव और गुड़ से भी ज्यादा मीठी बोली जो की सामने वाले को मन्त्र मुग्ध कर देती थी .

उसकी नजरे भी सभा से कुछ वक़्त निकाल कर हमारी नजरो को अपने होने का अहसास करा देती थी . बातों मे पता चला की उसकी गणित बहुत ही कमजोर है और मैं  ठहरा गणित से बीससी बस मिल गया हमको भी मौका अपनी काबिलियत दिखाने का हर रोज शम को बस दिक्कत यही थी की आसिफ़ भाई का साथ जरूर छूट गया . इधर आसिफ़ भाई का साथ छूटा उधर हर शाम नये नये पकवानो से रिश्ता जुड़ गया , उसकी भाभी पाककला मे निपुण थी और उन्हे नित नये - नये पकवान बनाने का शौक था हमने भी सोच लिया की दामाद बनेंगे तो इसी घर के.

इधर आती रुझानो ने संकेत देना शुरु कर दिया की अब सही वक़्त आ गया है अपने अंदर के ज़ज्बातो को बाहर निकलने का बस हमने भी एक अच्छा सा मुहूरत देखकर बोल ही दिया जवाब तो पहले से नही मालूम था पर जो कुछ आया उसकी हमने कल्पना भी नही की थी पता चला की उसने दो दिन पहले ही हमारी पुस्तक मे एक पन्ने पर अपना इजहार कर दिया था यहा भी हम पीछे रह गये .

यूनिवर्सिटी मे अभी कक्षाये प्रारंभ ही हुई थी की बाहर शोरगुल मचने लगा पता चला की शहर मे दंगे शुरु हो चुके है . सब अपनी अपनी जान बचाने को भागने लगे . मैं  भी अपने घर तेजी से साइकल चलता हुआ निकल पड़ा रास्ते का नजारा वर्णन करने लायक नही था घर पहुचने से कुछ दूर पहले ही दो लोग मेरी तरफ तलवार लेकर आते हुए दिखाई दिये अचानक उनमे से एक के कदम दौड़ते दौड़ते रुक गये .... आसिफ़ मियां थे वो ............

घर पर सबकी निगाहे मुझे ही ढूंढ रही थी , मुहल्ले के लौंडो ने अपनी अलग टीम बना ली थी जो की 24 घंटे पहरा देते थे . कुछ सियासतदारो ने अपने स्वार्थ के लिये पूरा शहर ही जला दिया और हम सोचते रहे की ये धुंआ सा क्यो है . अगले दिन मुहल्ले मे बड़ी शान्ती थी कुछ के चेहरे बता रहे थे की ए बिजली अपने आस पास ही गिरि है . चढ़ा दी थी बलि सियासत के हकुमराणो ने कुछ ईमानदार पुलिसवालो और निर्दोष इंसानो की .
बस वो आखिरी सुबह थी उसको देखे हुए कुछ अरमान थे जल गये चिता मे कुछ अरमान थे चिता मे जलने वाले के उन्हे पूरा करने के लिये .........ना हमे कुछ मिला ना तुम्हे कुछ मिला फिर भी ना जाने आपस मे कितना है गिला ...सत्ता के जादूगर है वो इस जादू ने जाने कितनो को लीला ....

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त्रिशा और विजय भोजन समाप्त करने के पश्चात होटल के बगीचे में घूमने निकलते है।  बहुत ही सुन्दर नजारा था वो रंग बिरंगे फव्वारे , करीने से लगे अनेको सुन्दर पुष्प वाले पौधे , मखमली घास और चांदनी रात में हलके कोहरे की बरसात मन मोहने के लिए पर्याप्त थी ।


 त्रिशा  - पता है विजय जी आज से ठीक ३० साल पहले मां और पापा की भी मुलाकात भी इसी कोल्हापुर में हुई  थी। माँ यहाँ अपनी छुट्टियां बिताने आई थी और पापा दादा जी के साथ फैक्ट्री के काम से।
यही पर इसी होटल में माँ ठहरी हुई थी और पापा भी।

विजय - एक बात कहे त्रिशा जी आपकी माँ बहुत ही सुन्दर रही होंगी।
त्रिशा - हाँ पर आपको कैसे पता।
विजय (मुस्कुराकर) - क्योंकि आपके पिता जी को देखकर लगता है की आप भी अपनी माँ पर ही गई होंगी।
त्रिशा भी (मुस्कुराते हुए ) - तो इसे मैं क्या समझू अपनी तारीफ या पिता जी की बुराई।
विजय (झेपते हुए ) - नहीं मेरा कहने का  मतलब वो नहीं था....
त्रिशा बीच में ही बात काटते हुए - अच्छा तो क्या मतलब था आपका।

विजय बात को सँभालते हुए  - जी आपके पिता जी का ह्रदय तो बहुत ही विशाल है उनके विषय में कुछ भी अनुचित कैसे कह सकता हूँ , और आप तो साक्षात् देवी है।

त्रिशा - चलिए कोई बात नहीं .

चांदनी रात थी उस पर था तेरे जुल्फों का घना अँधेरा 

फिसलते कैसे नहीं हम तेरे प्यार में 
जब सामने हो दुनिया का सबसे खूबसूरत चेहरा 


दोनों देर रात एक दूसरे से बातें करते हुए होटल के कई चक्कर लगा लेते है , इन्ही बातों के सिलसिले आगे चलकर कब मुहब्बत में बदल जाते है दोनों को पता ही नहीं चलता , अभी तो बस शुरुआत थी। ........ 

आगे आगे देखिये इस इश्क में होता है क्या 
दीदार -ए - मुहब्बत में रात भर कोई सोता है क्या 

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विजय - जी मैडम 
त्रिशा - एक गुजारिश है आपसे 
विजय - बताइये 
त्रिशा - प्लीज आप मुझे मैडम ना कहे 
विजय - क्यों मैडम 
त्रिशा - देखा फिर मैडम 

विजय - नहीं मैडम वो बात ऐसी है की .... 
त्रिशा बीच में ही बात को काटते हुए 
- आपका मैडम कहना ऐसा लगता है जैसे मैं कोई बुढ़िया हो गई हूँ। 
विजय - ऐसी बात नहीं है मैडम 
त्रिशा - देखा फिर मैडम , अगर आपको लगता है की मैं बुड्ढी और खड़ूस हूँ तो आप मुझे मैडम कह सकते है। 
विजय - नहीं ऐसी बात नहीं है आप हमारी कम्पनी की मालकिन है इसीलिए मैं कहता था लेकिन अगर आप की यही इच्छा है तो ठीक है मैं आपको त्रिशा जी कहकर ही बुलाऊंगा। 
त्रिशा - अब हुई न सही बात 

विजय की नजरे झुक जाती है। 

त्रिशा  वेटर को बुलाती है और उसे टमाटर का सूप और गोभी के परांठे लाने को कहती है। 

विजय अचानक ही बोल उठता है - आपको कैसे पता की मुझे गोभी के परांठे पसंद है.
त्रिशा विजय की तरफ अचंभित नेत्रों से देखती है - अच्छा आपको भी गोभी के परांठे पसंद है मैंने तो अपनी पसंद का डिनर मंगवाया था। 

विजय मन ही मन ही मन सोचता है की इस लड़की को तो आज की लड़कियों की  तरह पिज्जा या अन्य विदेशी  व्यंजनों से लगाव होना चाहिए पर इसे तो शुद्ध देशी व्यंजन  ही पसंद है। 

विजय - जी बरेली में मां के हाथो के गोभी के परांठे मुझे हमेशा ही पसंद रहे है। 
त्रिशा - खुशनसीब है आप विजय जी जो आप की माँ आपके साथ है मैं तो बहुत छोटी थी तभी माँ का साथ छूट गया। पापा ने ही उनकी कमी पूरी करने की कोशिश की पर एक माँ की ममता तो एक माँ ही दे सकती है।कहते हुए त्रिशा भाउक हो उठती है। 

विजय त्रिशा को दुखी देख विषय बदलने की कोशिश करता है 

विजय - आप कभी बरेली आई है। 
त्रिशा - नहीं 
विजय - एक बार जरूर आइयेगा परांठे के साथ चिली पनीर भी मिलेंगे। 
त्रिशा  - अच्छा तो जनाब को ये भी पसंद है उसका भी ऑर्डर देते है माँ के हाथो का नहीं तो क्या। 
विजय - अरे त्रिशा जी मैं तो वैसे ही कह रहा था खामख्वाह आपको परेशान होने की जरुरत नहीं है। 
त्रिशा - इसमें परेशान होने की क्या बात है। कम से कम आपने अपनी पसंद तो बताई नहीं तो आप तो करेला खाने को भी तैयार थे। कहते हुए त्रिशा मुस्कुरा देती है और उसे देखकर विजय भी मुस्कुरा देता  है। 

त्रिशा बैरे को बुलाकर चिली पनीर का ऑर्डर भी दे देती है। 

बहुत दिनों बाद किताबो की गहराइयों से निकलकर त्रिशा किसी शख्स के साथ बातें कर रही थी उसे खुद नहीं पता था की जिंदगी और किताबों में कितना अंतर होता है। किताबें पढ़ना तो आसान होता है पर किसी शख्स का चेहरा पढ़ना सबसे मुश्किल। 

विजय का संकोची स्वभाव और मासूमियत  ने कही न कही अपना काम करना शुरू कर दिया था। त्रिशा भी अभी इस बात से अनजान थी। और विजय भी इससे बेखबर था। 


वेटर भोजन लेकर आता है और दोनों खाना शुरू करते है। 

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bareli ka peda part - 4

बरेली का पेड़ा  - 4 bareli ka peda in hindi



पूर्णिमा की वो रात जिसमे निकला था एक चाँद  विजय को आज भी है याद

ठण्ड की रातें वाकई बहुत सुहानी हो जाती है जब वो कही दूर वादियों में गुजरती है।  विजय पहली बार किसी आलिशान होटल में रात्रिभोज करने वाला था मुंबई में तो अक्सर सड़क किनारे लगने वाले ठेलो से ही उसका काम चल जाता था , यहीं आकर उसने पावभाजी का स्वाद लिया जिसे मुंबई जैसे शहर में गरीबो का भोजन कहा जाता है। बरेली में बने अपने घर के खाने की याद विजय को हमेशा ही आती थी , मां के हाथो के बने गोभी के परांठे और चिली पनीर की सब्जी विजय के पसंदीदा व्यंजन है। गोभी के परांठो का तो विजय इतना शौकीन था की गर्मी के दिनों में भी कही न कहीं से गोभी  ढूंढ लाया करता था।


त्रिशा तैयार होकर होटल के रेस्टोरेंट में पहुँचती है ,वहाँ विजय पहले से ही उसका इन्तजार कर रहा होता है .त्रिशा को देखते ही वह सन्न रह जाता है वजह आज त्रिशा  आसमान से उतरी  किसी परी सरीखी लग रही थी वैसे तो त्रिशा सादगी वाले ही वस्त्र जैसे सलवार सूट ही पहनती थी। परन्तु आज उसने साड़ी पहनी थी।
काले  रंग की साडी ऊपर से खुले बाल और बिना किसी मेकअप के साक्षात् सुंदरता की देवी लग रही थी , विजय तो  उसे देखते ही रह गया। 

त्रिशा - क्या मैनेजर साहब आप तो आज बहुत ही स्मार्ट लग रहे है। 
विजय (थोड़ा शर्माते हुए) - नहीं मैडम आप तो स्वयं  किसी राजकुमारी से  कम नहीं लग रही है.
त्रिशा (मुस्कुराते हुए )- अच्छा जी , तारीफ़ करना तो कोई आपसे सीखे। 

 अब विजय क्या बताता की वाकई त्रिशा कितनी खूबसूरत लग रही  थी। अगर वो उसकी मालकिन नहीं होती फिर तो वो उसकी खूबसूरती का विस्तार  से वर्णन करता ,परन्तु वो भी अपने  कद को पहचानता था इसीलिए उसने बात को वही विश्राम दिया। पर त्रिशा तो आज जैसे विजय को परेशान करने के मूड थी। 

त्रिशा - बताइये मैनेजर साहब क्या खाएंगे आप। 

विजय - जो आपकी मर्जी मैडम। 

त्रिशा - फिर तो आज हम करेले के सूप से शुरुआत करते है (ऐसा कहते हुए वो विजय का चेहरे  वाले भाव को देखने लगती है )
विजय - थोड़ा सकुचाते हुए कहता है "जी मैडम " 
विजय को करेले से सख्त नफरत थी  उसका मानना था की  करेले जैसी कड़वी चीज सब्जी कहलाने लायक भी  नहीं है।यही सोचते हुए की आज तो वो बुरी तरह फस गया उसका चेहरा किसी बच्चे की तरह लगने लगा था। उसके मासूम चेहरे पर आने वाले भावो को देखकर त्रिशा खिलखिला के हस पड़ती है। लेकिन वो अभी विजय को किसी तरह की राहत देने के मूड में नहीं थी। 

विजय - क्या हुआ मैडम 
त्रिशा (हँसते हुए )- कुछ नहीं विजय जी करेला तो मुझे पसंद नहीं है , वो तो मैंने आपके लिए मंगवाया है ,मैं टमाटर के सूप से ही काम चला लूंगी। 

अब तो विजय का मासूम चेहरा नारियल के छिलके की तरह उतर चुका था। बड़ी मुश्किल  अपने चेहरे के भावो को छुपाते हुए वह कहता है की। 

-  मैडम मैं सोच रहा था की मैं भी टमाटर के सूप से ही शुरुआत करू क्या है की ठंड के मौसम में मुझे करेला सूट नहीं करता। गर्मी की सब्जी गर्मी में ही खाई जाये तो सेहत के लिए अच्छा रहता है।  

त्रिशा को खेती किसानी के बारे में रत्ती भर भी जानकारी नहीं थी उसे नहीं पता था की करेला गर्मी के मौसम की सब्जी है। अपनी हार होती देख वो कहती है   -    ठीक है हम दोनों ही टमाटर का सूप मंगाते है। 
क्रमश :...... 

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barely ka peda part - 3



बरेली का पेड़ा  - 3 bareli ka peda



कहते है की  इंसान की अच्छाई उसके कार्यो  से परिलक्षित होती है और अच्छे इंसानो मांग हर जगह रहती है। 
बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा भर पेट भोजन हो जाने के बाद विजय उसे लेकर अपने साथ बाहर निकलता है वह सोचने लगता है की अभी तो मैंने इसकी मदद कर दी परन्तु इनका प्रतिदिन का गुजारा कैसे होगा विजय को विचारमग्न देख त्रिशा उससे पूछ बैठती है :

त्रिशा - "क्या सोच रहे है मैनेजर साहब  "
विजय -जी  कुछ नहीं मैडम 
 त्रिशा ( बुजुर्ग की तरफ इशारा करके बोलती  है की)  -  मैं सोच रही थी क्यों न इनकी काबिलियत के अनुसार इनको अपनी कोल्हापुर वाली फ़ैक्ट्री में कुछ हल्का सा काम दे दिया जाये जिससे की इनके दैनिक दिनचर्या का काम पूरा हो सके। 

विजय जिस बात को लेकर चिंता कर रहा था उसका समाधान इतनी आसानी से मिल जायेगा उसने सोचा भी नहीं था।  उसने मैडम का शुक्रिया अदा किया और बुजुर्ग से इस सिलसिले में बात करने को मुखातिब हुआ बुजुर्ग भी उनकी बाते सुन रहा था और उसके मन में  कही न कही उन दोनों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी इसलिए वो उनके साथ चलने के लिए तैयार हो गया। 

विजय  -  मैडम मुझे तो मालूम भी नहीं था की आपका ह्रदय इतना विशाल है सत्य ही है आप अठावले जी जैसे महान इंसान की संस्कारवान पुत्री है। 

त्रिशा - नहीं मैनेजर साहब, गुण तो आपके अंदर भरे हुए है मुझे लगा आप भी आज की पीढ़ी की तरह ही व्यावसायिक रुख अख्तियार करते होंगे परन्तु आप के अंदर मानवता जैसे गुणों का समावेश भी है ये आज जानने को मिला। 

विजय - नहीं मैडम मैं तो एक अदना सा इंसान हूँ जिसे आपके पिता जी ने तराश के इस काबिल बनाया की वो भी समाज के लिए कुछ कर सके। 

त्रिशा , विजय की शैली से काफी प्रभावित होती है और  फिर वापस गाड़ी में बैठकर सभी  सफर के लिए निकल पड़ते है  .
विजय सोचता है की विदेश में रहकर भी इस लड़की के अंदर भारतीय संस्कार इस कदर भरे  हुए है और एक वे लड़किया है जो भारत में रहकर भी विदेशी संस्कृति को अपनाने में विशेष रूचि दिखाती है। भारतीय संस्कृति आज भारत से निकलकर विदेशो तक में फ़ैल रही है और लोगो को एक सुव्यवस्थित जीवनशैली प्रदान कर रही है वही पाश्चात्य संस्कृति अपनों से ही अपनों को दूर करने में लगी है स्त्रियों के लिए परिवार का अर्थ स्वयं के पति तक रह गया है।  रिश्तो की डोर कही न कही टूट रही है  और नए स्वार्थवादी रिश्तो का जन्म हो रहा है। जिससे मनुष्य सबकुछ होने के बावजूद अंदर से खोखला होते जा रहा है। 

ठण्ड के मौसम में गाड़ी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती है रास्ते में ही विजय बुजुर्ग से उनका नाम और पता पूछता है उसे ताज्जुब होता है ये जानकर की ये मामूली सा दिखने वाला आदमी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रह चुका है जिसके दोनों लड़को ने उसे घर से निकाल दिया और सारे पैसे तथा संपत्ति पर अपना अधिकार कर बैठे।सरकार की तरफ से मिलने वाली पेंशन भी अभी कार्यालयों के चक्कर काट रही है। अभी वह और कुछ जानता  तब तक त्रिशा उसे बहार का मनोहारी दृश्य देखने को कहती है  सूरज भी अब ढलने ही  वाला था  की  वे कोल्हापुर में प्रवेश करते है।  गाड़ी एक शानदार होटल में जाकर रूकती है  जहा पहले से ही सबके कमरे आरक्षित  रहते है।

ड्राइवर और भीकू सामान उतारते है और बाकि लोग रिसेप्शन की ओर आगे बढ़ते है।सबके कमरे तो आरक्षित थे सिवा उन बुजुर्ग के इसलिए विजय उनको अपने कमरे में साथ ले गया।त्रिशा रात में भोजन साथ में करने की बात कहकर अपने कमरे में विश्राम करने चली गई। क्योंकि अभी तो वो रात बाकि थी जहाँ से  कहानी एक नया मोड़ लेने वाली थी। 

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बरेली का पेड़ा -2 

बरेली का पेड़ा -1 

  

barely ka peda part 2

बरेली का पेड़ा - 2 


बरेली जैसे छोटे शहर का लड़का विजय  अभी मुंबई जैसे महानगर में खुद को अकेला ही समझता था , उसके  मौसेरे भाई और विजय के  ऑफिस का  समय  अलग - अलग होने की वजह से उनकी मुलाकात छुट्टी के दिन ही होती थी। विजय की कम्पनी की एक फ़ैक्ट्री मुंबई से दूर कोल्हापुर के पास स्थित थी काफी पुरानी  होने के कारण उसमे पुनःनिर्माण का कार्य प्रारम्भ होना था कंपनी की शुरुआत भी इसी फ़ैक्ट्री से हुई थी यही वजह थी की त्रिशा भी इस फ़ैक्ट्री को देखना चाहती थी जिसकी नींव उसके परदादा ने रखी थी। पुनःनिर्माण के कार्य हेतु विजय को चुना गया क्योंकि मालिक गुणवत्ता से किसी तरह का समझौता नहीं चाहते थे। उधर त्रिशा भी सड़क के रास्ते ही कोल्हापुर तक जाना चाहती थी जिससे वह रास्ते की खूबसूरती देख सके और अलग - अलग तरह के लोगो से भी मिल सके।
मालिक श्री हरगोविंद अठावले एक बहुत ही सुलझे हुए समझदार इंसान थे तथा वे विजय पर पूर्ण विश्वास करते थे इसलिए उन्होंने विजय और त्रिशा को एक साथ भेजने का फैसला किया और साथ में घरेलु नौकर भीकू और ड्राइवर हीराभाई जो की अठावले जी का विश्वास पात्र था  ।

 कितनी खूबसूरत है ये दुनिया हरे भरे रास्ते ऊँची ऊँची  पहाड़िया  यात्रा शुरू हो चुकी थी और विजय रास्ते की खूबसूरती देख कर विचार में मग्न था उसने आजतक कल्पना नहीं की थी की कभी उसकी जिंदगी में इस तरह के दिन भी आएंगे  लेकिन उसे क्या पता की नसीब अभी उसे और कहा लेकर जाने वाला है। त्रिशा भी कई साल बाद पढाई से फुर्सत पाकर सफर पर निकली थी अमेरिकी जीवन शैली उसे कतई  नहीं पसंद थी  वो तो बस यही सोचा करती थी की कब उसे वापस अपने घर जाने को मिलेगा।  खैर रास्ता वाकई बहुत खूबसूरत था।  कुछ घंटो  के सफर के बाद गाडी एक होटल पर रूकती है व सभी लोग चाय नाश्ता करते है होटल के बाहर गेट पर एक बुजुर्ग अत्यंत ही दीन  अवस्था में पड़ा हुआ था व आने जाने वाले लोगो से भोजन हेतु भीख मांग रहा था होटल के कर्मचारियों द्वारा भगाये जाने के बाद भी वह बार - बार वापस आ जा रहा था।  विजय के पास जाने पर वह कहता है की 
- साहब गरीब को रोटी के लिए कुछ दे दो भगवान् आपके बाल बच्चो को दुआएं देगा 
 पता नहीं उस बुजुर्ग को देखकर विजय को ऐसा अहसास हुआ की उसका  उससे कोई ना कोई रिश्ता जरूर है चाहे वह पिछले जन्म का ही क्यों न हो 
 विजय गाडी में जाता है और अपने बैग में से कुछ कपडे निकालकर उस बुजुर्ग को अपने हाथो से पहनाता हैं उसके बाद उसे लेकर होटल में जाता है और बुजुर्ग की पसंद का खाना मंगवाता है  खाना आने पर वृद्ध व्यक्ति उस पर ऐसे टूट पड़ता है जैसे कई दिनों की भूख आज शांत करके रहेगा। 
विजय का ह्रदय द्रवित हो उठता है और आँखे भर आती है। दूर खड़ी त्रिशा यह सब देखती है और उसके मन में विजय के लिए सम्मान की भावना आती है। वह सोचती है की उसने तो आजतक ऐसे ही लोगो को देखा है जो सीधे मुंह अपने से छोटे लोगो से बात भी नहीं करते गरीब और निर्धन लोगो की बस्तियों में नहीं जाते भिखारियों को घृणा की दृष्टि से देखते है ऐसे में विजय के अंदर उसे वो इंसानियत दिखती है जो आज के कलियुग में विलुप्त हो चली है। .. शेष क्रमश


प्रथम भाग - 

बरेली का पेड़ा -१ 




barely ka peda part 1

बरेली का पेड़ा -1  barely ka peda -1


कहते है परिंदे के लिए सारा आकाश ही उसका घर होता है  वह कही भी स्थाई तौर  पर अपना घोंसला नहीं बनाते । आज इस डाल कल उस डाल, विजय  भी इन परिंदो को देखकर सोचा करता था की कितने  खुशनसीब होते है ये ना  इन्हे  सरहदों की फ़िक्र ना  इन्हे आशियाने  की चिंता। आम समस्याये इनकी जिंदगी में होती होगी तो क्या होती होंगी ?
एक हमारी जिंदगी है जिसमे हम उन्मुक्त होकर अपनी उड़ान भी नहीं भर सकते।  आधुनिकतावाद  और धन की लालसा   हमारी जिंदगी में सिवाय तनाव के हमें दे ही क्या रही है। जिम्मेदारियों के बोझ तले इंसान इतना दब  चुका है की उसे अपने विषय में सोचने तक की फुर्सत नहीं है  सच ही कहा गया है  की  " तुम्हे गैरो से कब फुर्सत हम अपने गम से कब खाली चलो हो चुका मिलना ना तुम खाली ना हम खाली " . 

कुछ इन्ही विचारो के साथ मुंबई जैसे नए शहर में विजय का  आगमन होता है , कहते है मुंबई एक ऐसी मायानगरी है जिसमे इंसान यदि एक बार आ गया तो फिर फसते ही जाता है। विजय छोटे से शहर बरेली का रहने वाला है और घर की जिम्मेदारियों को निभाते निभाते यहाँ तक चला आया है , यहाँ उसका मौसेरा भाई किसी कंपनी में काम करता है  और उसी ने विजय को काम दिलाने के लिए इस शहर में बुलाया है , छोटे शहरो में रोजगार न होना एक गंभीर समस्या का रूप लेते जा रही है जिससे इन शहरो में रहने वाले लोग पलायन के लिए मजबूर है। अनेक प्रकार से प्रयास करने के बाद जब विजय ने देखा की इस छोटे से शहर में उसकी शिक्षा के अनुसार कोई भी कार्य नहीं है और घर पर बूढ़े माँ - बाप और दो छोटी बहनो की जिम्मेदारियां उसी के सर पर है तो उसने पलायन करना ही उचित समझा।  


घर से विदा लेते समय उसकी आँखे  भर आई थी जीवन में पहली बार उसे अपने परिवार से अलग होना पड़  रहा था  माता - पिता की आँखे भी अपने इकलौते पुत्र हेतु लगातार गंगा की धारा की तरह बहे जा रही थी। मुंबई आने के बाद विजय के मौसेरे भाई ने उसे एक कंपनी में क्लर्क की नौकरी दिलवा दी। विजय प्रतिदिन ऑफिस के समय से एक घंटा पूर्व ही पहुँच जाता था और दिन भर  पूरी निष्ठा से काम किया करता था। एक बार उसने कंपनी में होने वाले हेर - फेर को कागजो में पहचानकर उसकी शिकायत कंपनी के मालिकों से कर दी , यह हेर - फेर कंपनी के मैनेजर और बड़े बाबू की सांठ - गाँठ से कई वर्षो से किया जा रहा था।  विजय कामर्स का  छात्र था और उसने एम् काम  में रुहेलखंड विश्वविद्यालय टॉप किया था। पहले तो पता चलने पर मैनेजर और बड़े बाबू ने उसे अनेक प्रकार से डराने की कोशिशे की व उसे नौकरी से निकलने की धमकी भी दी लेकिन विजय कहा किसी से डरने वाला था उसपर तो ईमानदारी का नशा सवार था  अंत में सारे दांव विफल होते देख विजय को धन का प्रलोभन भी दिया गया परन्तु नमक हरामी विजय के खून में आ जाये मुमकिन ही नहीं।  विजय की ईमानदारी से प्रभावित होकर मालिकों ने विजय को कंपनी का मैनेजर बना दिया। 

मैनेजर बनने के फलस्वरूप विजय ने जल्द ही अपनी दोनों बहनो की शादी एक अच्छे खानदान में कर दी व माता - पिता की सेवा के लिए एक नौकर रख दिया। विजय की ईमानदारी से उसके मालिक काफी प्रसन्न रहते थे व जल्द ही विजय उनका विश्वास पात्र बन गया।   विजय आज भी उसी सादगी से रहता था जैसा की वह गांव से आया था हाँ पर बातचीत के लहजे में कुछ मुम्बइया झलक आ गई थी।  मालिक की इकलौती  बेटी अमेरिका से पढाई पूरी करने के बाद वापिस मुंबई आती है नाम था त्रिशा।  वैसे तो त्रिशा विलायत में रही थी पर सिवा ज्ञान के वह वहां से भारत में कुछ भी लेकर नहीं आई थी। अमेरिका और उसकी संस्कृति उसे बिलकुल पसंद नहीं थी  परन्तु शिक्षा के लिए वह कही भी जा सकती थी। पढाई से उसे बेहद लगाव था अक्सर उसका समय मोटी - मोटी किताबों में ही बीतता था। इंडिया आने के बाद खाली समय में वह कभी कभी ऑफिस चली जाया करती थी। विजय से उसकी मुलाकात एक मालिक और मुलाजिम के रूप में ही हुई थी , विजय लड़कियों के मामले में बहुत ही शर्मीला और संकोची था इसलिए वह जल्दी त्रिशा के सामने नहीं जाता था। लेकिन एक दिन ऐसा कुछ हुआ की विजय को पुरे दो दिन त्रिशा के साथ रहना पड़ा और उसकी जिंदगी ने एक नया रूप लेना शुरू किया। शेष अगले अंश में। .. 



jane tu ya jane na

जाने तू या जाने ना  jane tu ya jane na  -


कब  मैंने  कहा था  की मुझे तुझपे ऐतबार नहीं 
इन छोटी छोटी बातों में प्यार नहीं 
कही अफसाना न बन जाये अपनी कहानी 
कही तू मत कह देना की तुझे मुझसे प्यार नहीं 

वो भीगते हुए  तेरे दीदार की चाहत 
वो  तेरी मुस्कुराहटो  में ढूंढती  हंसी अपनी 
वो  इन्तजार  में बैचेन निगाहें 
जाने तू या जाने ना 

काश कभी जिंदगी में वो मुकाम आता 
की बताते तुझे अपने दिल का हाल 
काश की तू इतना न भाता 
की बदली न होती अपनी चाल 


काश की इन धड़कनो में तू न  समाता 
की हर तरफ तू ही नजर आता 
इश्क़ हो गया है तुझसे 
माने  तू या माने  ना 
अधूरी सी लगती है जिंदगी अब तेरे बिन 
जाने तू या जाने ना 



 

naya dour(poetry)

main aur wo

नया दौर naya dour 



हम भी नए थे कभी इस शहर में फरबरी माह में 
वो मिली थी कभी बीच राह  में

मुंह का ढक्कन खुल गया था 
और आँखों से ऐनक हट  गया था 

देखा  उनको तो दिल की धड़कन बढ़ने लगी
 और नजरो से नजरे लड़ने लगी 

हमने भी आंव न देखा न ताव 
लेके पहुँच गए बड़ा पाव 

और बोल दिया उनसे 
की इश्क़ हो गया है तुमसे 

तोहफा करो कबूल 
क्योंकि इश्क़ का ये है पहला उसूल 

शर्मा के मुस्कुरा दी वो 
और एक ही झटके में पूरा बड़ा पाँव खा गई वो 

और फिर लेकर डकार 
बोली आई लव यू  मेरे यार 

फिर क्या था 
लेके अपनी फटफटिया 
घूमे छपरा से लेकर हटिया 

तभी सामने आ गए पप्पा 
दिया खिंच के एक लप्पा 

जी भर के दिया  हमको  गाली 
नालायक , कमीना,लोफर  और मवाली 

देखा हमको पीटते 
वो भी चुपके से खिसके 

हमने कहा यही था साथ तुम्हारा 
पल भर में जीने मरने की कसमे  खाई थी 
और पल में साथ छोड़ गई हमारा

वो बोली कैसी कसमे  कैसा प्यार
ये तो है बाते बेकार 

ना  मैं हीर ना  तू रांझा
प्यार नहीं अब किसी का सच्चा 

आज तू कल कोई और है 
यही नया दौर है 

हमने भी बोल  दिया उससे
दौर चाहे कोई हो चाहे ये आँखे रोइ हो
आज भी हीर है आज भी है रांझा 
बस मैं ही थोड़ी देर से समझा।   


lekhak
लेखक 



tera jana



main aur wo

तेरा जाना (कविता )-tera jana (poetry)


शाम होने लगी ज़िन्दगी की अब 
रात का दर हमें अब सताने लगा 

तन्हा  हम भी थे , तन्हा तुम भी थी - मगर
सैलाब आंसुओ का, अब रोका जाने लगा 

 तुम  कहती रही खुद से ही मगर  - 2 
गम अपना कभी हमें बताया नहीं 

सांस धीमी पड़ी नब्ज थमने लगी 
दर्द चेहरे पे तुमने दिखाया नहीं 

वक़्त कम  सा पड़ा हम थम से गए 
कुछ हमारे समझ में भी आया नहीं 

आ गई वो घडी जब तुम चल सी पड़ी 
अकेले हम थे यहाँ, और थी आंसुओ की लड़ी 
खुदा ने भी हम पे तरस खाया नहीं 
हम समझ ना सके हो रहा है ये क्या -2 
और तुमने कभी हमें समझाया नहीं 

चली गई तुम कहा ,रह गए हम यहाँ 
ये जमाना हमें रास आया नहीं 

अब तो अकेले है हम ,और है तेरा गम 
एक लम्हा नहीं जब तू याद आया नहीं 

शाम होने लगी. .. ... ....... ......... ....... 


main aur wo
लेखक 



gorakhpur to lucknow

gorakhpur to lucknow
गोरखपुर से लखनऊ 

गोरखपुर से लखनऊ  - gorakhpur to lucknow


स्टेशन  पे गाड़ी की सीटी के साथ ही मेरी ट्रेन भी   धीरे - धीरे रफ़्तार पकड़ने लगी। घर से बाहर ये मेरा पहला कदम था कारण लखनऊ में मेरा एडमिशन एक इंजीनियरिंग कॉलेज में हुआ था और कल उसकी रिपोर्टिंग है। घर पे अकेले होने और पिता जी की तबियत ख़राब होने के कारण गोरखपुर से लखनऊ तक का सफर मुझे अकेले ही तय करना पड़ा। पारिवारिक स्थिति ठीक न होने के कारण सबकी उम्मीदे मुझी से थी। फिलहाल ट्रेन के जनरल कम्पार्टमेंट में सवार मैं खड़ा - खड़ा ही अपने भविष्य  के सपने बुनने में व्यस्त था तभी पीछे से किसी  की आवाज आई पीछे मुड़के देखा तो एक लड़की आगे बढ़ने का रास्ता मांग  रही थी। 

काली आँखे ,गुलाबी गोरापन और सुंदर मुखड़े को मैं अनायास ही   ध्यान से देखने लगा उसके चेहरे की सादगी देख के अचानक मुझे लगा की जैसे ज़िन्दगी कुछ कह रही है और मैं ध्यान से सुन रहा हूँ मैं उसको रास्ता देते हुए  किनारे   हो  गया।  अब तो गोरखपुर से लखनऊ का सफर सुहाना सा लगने लगा था। दिल में एक अलग ही उमंग थी कई तरह के सपने भी देखने चालू हो गए। थोड़ी देर बाद वो लड़की वापस आई और बगल से होते हुए मेरे पीछे वाली सीट पे ही बैठ गई ,शायद मैंने पहले पीछे मुड़  के देखा ही नहीं था नहीं तो पहले ही  उसे देख लेता खैर अभी ट्रेन की रवानगी हुए कुछ ही समय हुआ था।  फिर तो मैंने भी अपनी दिशा बदल ली और अपनी नजरे उसकी ओर कर ली , कई बार हमारी नजरे आपस में टकराई पर उन नजरो में नजाकत और शराफत दोनों ही भरी हुई थी और लग रहा था साथ में कुछ अलग एहसास की शुरुआत भी हो रही थी शायद यही पहली नजर का  प्यार है।

 बस्ती  स्टेशन पे कुछ सवारियों के उतरने से मुझे उसके सामने वाली ही सीट मिल गई  मुझे लगा जैसे ईश्वर ने मेरी मुराद ही पूरी कर दी अब वो मेरी नजरो के ठीक सामने ही थी। इशारो ही इशारो में मुझे पता चला की वो भी अपनी मौसी के साथ लखनऊ ही जा रही थी और लखनऊ  में अपनी मौसी के साथ रहकर यूनिवर्सिटी से बी काम प्रथम वर्ष की छात्रा थी। 

उसकी मौसी बहुत ही कड़क मिजाज की थी इसलिए वार्तालाप का माध्यम इशारा ही  था। लखनऊ आते आते हमने एक दुसरे का पता ले लिया था जिससे की हम मिल सके ,लखनऊ स्टेशन पहुंचने पे ऐसा लगा जैसे पूरा सफर सिर्फ चंद लम्हो ही का था ,स्टेशन पे विदा होते समय एक अजीब मायूसी थी, लग रहा था मानो कोई हमसे हमारा सब - कुछ लेके जा रहा है उसकी आँखों में भी एक अजीब सी नमी थी। इत्मीनान बस इतना ही था की अगली मुलाक़ात  की गुंजाइश बची हुई थी। और इन्ही अगली मुलाकातों ने उसे ज़िन्दगी भर के लिए मेरा हमसफ़र बना दिया। आज भी हम वो पहली मुलाक़ात और गोरखपुर से लखनऊ का सफर याद करके रोमांचित हो उठते है। 

आरम्भ - मैं और वो 
  

main aur wo


main aur wo
मैं और वो 



हमारे वास्तविक जीवन में कई घटनाये ऐसी होती है जो अपनी छाप हमारे जीवन में छोड़ जाती है और कुछ ऐसी होती है जो हमारी दिशा ही बदल देती है। अक्सर इस बदलाव का कारण कोई और होता है और जब बदलाव का कारण कोई  लड़की  होती है तो  उसे हम वो से सम्बोधित करते है।  


main aur wo
main aur wo

इन्ही सारी  कश्मकश के बीच कुछ रूहानी यादें रह जाती है और कहानी शुरू होती है , इन कहानियो  में अक्सर ही दो पात्र प्रमुख होते है एक मैं और एक वो यानी " मैं और वो "


जल्द ही इस ब्लॉग पे  " मैं और वो " नामक एक नई कहानी सीरीज शुरू होने जा रही है । आप भी अपनी रचनाये मैं और वो सीरीज में भेज सकते है।  सोमवार को इस सीरीज की पहली कहानी प्रकाशित होगी. उम्मीद है आप सब को अवश्य पसंद आएगी अपनी प्रतिक्रियाएं इस सीरीज और ब्लॉग के प्रति अवश्य दे।  आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है।                                             


                                                                                                             रायजी 


मजेदार  -  

#वैलेंटाइन दिवस के पटाखे 


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