भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी को नम आँखों से श्रद्धांजलि

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social media vs news channel

सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनल social media vs news channel


social media vs news channel
सोशल मीडिया 


जबसे फेसबुक ,व्हाट्सअप और इस जैसे अन्य अस्त्रों  का अवतरण हुआ है तबसे घर में मुंह बांधके बैठने वाले लोग भी अचानक से अपने विराट अवतार में मंच पे आने लगे है। बस कमाल  है कुछ उंगलियों का जो कीबोर्ड या टच स्क्रीन पे चलती है। पहले इंडिया - पाकिस्तान के मैच में टीवी गुस्सा उतरने का एक प्रमुख माध्यम हुआ करती थी। पर अब तो सोशल मीडिया पे ही वॉक युद्ध शुरू हो जाता है नित्य नए - नए शब्दों के अविष्कार होते रहता है जिनके प्रहार से विरोधी खेमे में तहलका मच जाता है।



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न्यूज़ चैनल 


मुद्दा चाहे राजनीति का हो खेल का हो या समाज से जुड़ा हो सारी बातें आपको न्यूज़ चैनल से पहले सोशल मीडिया के माध्यम से मिल जाती है , हद तो तब हो जाती है जब परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र तक आपके व्हाट्सअप पर आ जाता है। एक समय था जब सोशल मीडिया के खिलाड़ी समाज में किसी तरह की अफवाह फ़ैलाने में कामयाब हो जाते थे इसके लिए वे साल भर पुरानी खबर मसाला लगाकर नए रूप में परोसते थे  या किसी अन्य जगहों की तस्वीर या विडियो दिखाकर उनका गलत इस्तेमाल किया करते थे ऐसे में सोशल मीडिया की विश्वसनीयता संदेहास्पद हो जाती थी बदस्तूर इनका खेल अभी भी जारी है परन्तु सोशल मीडिया के उपयोगकर्ता इन सारी बातो को अच्छे से समझने लगे है। अब इन पर वायरल खबर की पड़ताल करने के बाद ही उन पर विश्वास किया जाता है। इन खबरों की पड़ताल कई न्यूज़ चैनल भी करते है और अपने चैनल पे जासूसी जैसा धारावाहिक  बनाकर परोसते है। 

शायद ही कोई ऐसा घर या व्यक्ति हो जो सोशल मीडिया पे उपस्थित न हो। क्योंकि इस प्लेटफार्म पे उपस्थिति दर्ज न कराना  पिछड़ेपन की निशानी माना  जाता है ,इसी कारण  सारे न्यूज़ चैनल भी सोशल मीडिया पर उपस्थित है। कभी इनके कमेंट बॉक्स में जाके तो देखिये आपको सम्पूर्ण भारत की  विचारधारा की झलक मिल जाएगी ,और साथ में  कई उपयोगकर्ताओं के बीच चलने वाले वॉक युद्ध की झलक भी जिनमे कई ऐसे शब्द मिलेंगे जिनसे आप भी परिचित नहीं होंगे। 

न्यूज़ चैनल अक्सर खबरों को अपनी trp के अनुसार प्रबंधित करते है और इसके लिए वे किसी भी हद तक चले जाते है , एक ही खबर की अलग - अलग  न्यूज़ चैनलो पे  अलग - अलग व्याख्या की जाती है , जबकि  सोशल मीडिया में खबर  तो वही रहती है लेकिन उसपे आने वाले कमेंट अत्यंत ही रोचक होते है। अगर कोई खबर अच्छे तरीके से प्रस्तुत है तो उसको सराहना भी मिलती है , कभी कभी तो कोई खबर या वीडियो इतना पॉपुलर हो जाता है की उससे समबन्धित व्यक्ति अचानक से ही सुर्खियों में आ जाता है जिसकी उसे भी कोई उम्मीद नहीं रहती, तत्काल में वेलेंटाइन डे से पूर्व प्रिया  प्रकाश वारियर इसका सबसे बड़ा उदहारण है जो की पुरे देश का नेशनल क्रश बन गई थी। और उनके इंस्टाग्राम खाते में एक ही दिन में अनुयाईयों की संख्या छः लाख पहुंच गई  इस वजह से उनका कॅरियर अचानक से चमक उठा। 

कुल मिलकर सोशल मीडिया वर्तमान समय में आम आदमी की आवाज बनता जा रहा है और इसकी पहुँच और बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इससे लाभ लेने वालो की संख्या भी जो इसको अपने  अनुसार ढालने की कोशिश करते दिख जाते है। ऐसे लोगो में सबसे अधिक संख्या राजनीतिज्ञों की है क्योंकि न्यूज़ चैनेलो को तो वे अन्य तरीको से प्रबंधित कर लेते है और न्यूज़ चैनल व्यावसायिक होने के कारण अपना मूल धर्म सच वो भी पूरा सच को सामने लाने की बजाय उनसे होने वाले लाभ और हानि की समीक्षा करने के बाद ही उनका प्रसारण करते है जबकि सोशल मीडिया में आम आदमी भी अपनी बात और और किसी घटना को शेयर कर सकता है।


इसी कारण पहले जो राजनेता सोशल मीडिया को एक शसक्त माध्यम बताते थे वही सोशल मीडिया में अपने कार्यो की परिणीति के फलस्वरूप अपनी घटती लोकप्रियता और सोशल मीडिया पर  आम आदमी के तर्कों से परेशां  इसके दुरूपयोग की बात कर रहे है।  

इंटरनेट क्रांति और खास तौर पर डाटा के घटते दामों ने सोशल मीडिया को और बड़ा करने का काम किया है और इसपर आने वाली अनेक नई  तकनीक इसकी प्रसिद्धि को और बढ़ा ही  रही है , वही व्यावसायिकता और गलत रिपोर्टिंग के कारण न्यूज़ चैनल इनका मुकाबला करने में कही से सक्षम नहीं दिखते। 

      
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न्यूज़  चैनलों पे होने वाली डिबेट  और उनकी प्रासंगिकता



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