dhanteras deepawali and family


धनतेरस , दीपावली और परिवार 

dhanteras deepawali and family



धनतेरस की सुबह से  ही  भौजाई  पूरे मूड में थी , घर के आँगन में जोर - जोर से उनके चिल्लाने  की आवाज आ रही थी  - 

'  बस अब बहुत हो गया इस रोज - रोज की  किचकिच से तो अच्छा है की हम अलगे हो जाये , जब से इस घर में आएं है तब से सुख का एक्को  दाना भी नहीं खाये है , कहा तो मायके में चार - चार लौड़ी लगी रहती थी  और इंहा खुद लौड़ी बनना पड़ रहा है '

 ' एक तो  हमरे मर्द की कमाई से पूरा घर चलता है ऊपर से छोटका से लेकर इस घर के बड़का तक  इंहा सब रोआबे  में रहते है. ........  अब बस बहुत हो गया अब  हम अलग हुए बिना नहीं मानेंगे नहीं तो इसी आँगन में हमारी समाधी बनेगी  और इस बरस की  दीवाली  सबको याद रहेगी  ....... और आप भी कान खोल के सुन लीजिये  ई सब जो आपसे लगाव दिखाते है। ... ई आपसे नहीं आपकी कमाई  से लगाव रखते है ' . 

क्या - क्या अरमान लेकर हम इस घर में आये थे।  हमारे माँ - बाप भी इहे सोच कर बियाह किये थे की लड़का सरकारी नौकरी में है लड़की हमारी राज करेगी , पर इंहा तो कोई और ही राज कर रहा है 

कान खोलकर सुन लीजिये आज बिना फैसला के हम नहीं मानने वाले 

आपको तो पति कहने में भी शर्म लगता है जो अपनी पत्नी को सुखी नहीं रख सकता  

बेचारे सास और ससुर अपने कमरे में एक दुसरे के  चेहरे को देखते हुए  बहु की बाते सुन रहे थे  किसी तरह की गलती ना होते हुए भी उन्हें अपने आप पर ग्लानि हो रही थी की आखिर कहाँ उनके फर्ज में कमी रह गई की हालात यहाँ तक बिगड़ गए।  उन्होंने तो सदैव बहु को बेटी की तरह ही  समझा था  भरसक कोशिश की थी की  कभी उसे अपने मायके की याद ना  आये।  बूढी और मधुमेह की रोगी सास भी बहु के बीमार रहने पर  उसकी तीमारदारी में दिन रात एक कर दिया करती थी । 

 मायके वाले तो बस मोबाईल का झुनझुना बजाकर  समाचार ले लिया करते थे। फोन पर सहानुभूति के साथ  विमर्श तो ऐसे दिया करते थे जैसे उनके फोन के बिना उनकी बिटिया की बिमारी ना छूटती । सढ़ूआने से लेकर  मौसिआने तक  चाची  , बुआ , भाभी और चचेरी बहनो के फोन की बाढ़ आ जाती थी लेकिन साल बीतने पर भी चौखट पर कोई पधारे ऐसा कभी न हुआ , हां इनसे (भाभी ) जरूर अपेक्षा रखी जाती थी। 

पति बेचारा अपने संस्कारो और रिश्तो के बीच एक झूले की तरह झूल रहा था।  गुलमोहर की तरह खिला रहने वाला चेहरा आज छुईमुई की याद दिला रहा था।  सबसे ज्यादा फ़िक्र तो उसे पड़ोसियों की थी जो दिन रात उसकी चौखट पर कान लगाए रहते थे।  आज अगर एक आवाज भी घर के बाहर गई तो पुरे मोहल्ले को मिर्च मसाला लगाने का मौका मिल जायेगा।  कल ही मिश्राइन आंटी कह रही थी की


  ' भई पूरा मुहल्ला आप के बेटे और बहु की तारीफ़ करता है , कैसे आते ही उसने पूरे परिवार को संभाल लिया।  आजकल ऐसी बहुए मिलती कहाँ है मुझे तो जलन होती है आपके राम जैसे बेटे और सीता जैसी बहु को देखकर '. 
वही मिश्राइन आंटी आज इस घर की बहु का नागिन रूप देखकर क्या कहेंगी। 

तिवराइन आंटी तो नारद मुनि का  स्त्री  संस्करण है जैसे नारद मुनि तीनो लोक में अपने पेट की बात उगिल कर आते थे वैसे ही तिवराइन आंटी अगल - बगल के तीनो मुहल्ले में कथा बाच  आती है , ऊपर से आज तो धनतेरस है एक ही स्थान पर रायता फ़ैलाने के लिए उन्हें पूरा समूह मिल जायेगा और दिवाली के  पटाखे की तो जरुरत ही नहीं पड़ेगी जब इतना बड़ा बम उनके पास होगा तो, मोहल्ले के हर घर में एक - एक बम गिराती जाएँगी और तबाही मचेगी हमारे घर में। 

देवर अपने तेवर को ठंडा करके एक कोने में बैठा हुआ था।  कहीं भैया भौजी का पूरा फ्रस्टेशन उसपे ना निकाल दे। अगर भैया अलग हो गए तो ? वो तो कहीं ना कहीं नौकरी करके अपना पेट पाल लेगा लेकिन माँ बाउ जी का क्या  ?  जिन्होंने अपने जिंदगी की पूरी पूंजी इस घर को बनवाने में और भैया को पढ़ाने में इस उम्मीद से  लगा दी  की वही तो उनके बुढ़ापे का सहारा है।  नहीं तो प्राइवेट नौकरी में इतना पैसा कहा की कुछ अपने लिए बचा के रख सके उनके जीवन भर की पूंजी तो हम दोनों भाई ही है। 

बहन दो दिन पहले ही ससुराल से आई थी। उसे पता था की भाभी बड़े घर की लड़की है थोड़ा भाव - ताव है लेकिन भैया पर उसे पूरा भरोसा था।  लेकिन अगर भैया ने भाभी की बात मान ली तो  ? आखिर वो भी तो उनकी धर्मपत्नी ही है ।  आखिर कब तक भैया हम सबके लिए अपना निजी सुख चैन त्यागते फिरेंगे ? अगर भैया अलग हो गए तो राखी के दिन वो किस भाई के घर पहले जाएगी ?

ससुर बेचारे धर्म संकट में फंसे हुए थे एक तरफ पुत्र मोह था तो दूसरी तरफ उसी पुत्र के  गृहस्थी की चिंता।  एक तरफ उनकी जिंदगी भर की कमाई हुए इज्जत थी तो दूसरे तरफ उनके बुढ़ापे की लाठी। 

त्यौहार को देखते हुए सर्वसम्मति से  फैसला  हुआ  की  त्यौहार के बाद  भैया बगल के जिले में जहाँ उनका ससुराल भी है  तबादला कराकर भाभी के साथ प्रस्थान करेंगे  जिससे  घर की इज्जत भी सलामत रहेगी  और मुहल्ले  से लेकर रिश्तेदारों के  मुख भी  दीवाली की मिठाई खाने  के अलावा  किसी अन्य कार्य हेतु नहीं खुलेंगे। 

फैसले के बाद कुछ छणो तक पुरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था , सिवाय  भाभी के कमरे के। 

भाभी के कमरे से सुरीले स्वर में  गुनगुनाने की आवाज आ रही थी। 

कौन तुझे यूँ प्यार करेगा........  जैसे मैं करती हूँ  ........ 



इन्हे भी पढ़े -  कहानी   
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लौंडे 


भोजपुरिया क्षेत्र की समस्या बहुत ही निराली है या कह सकते है की अधिकांश भारतीय क्षेत्र की ।  लौंडे ज्यादा हो गए है और सड़के हो गई है कम , बेचारे अपनी रफ़्तार को कैसे नचा - नचा के  कंट्रोल  करते है, यह कला तो पूछनी ही पड़ेगी।  

ये माचो कट मगरमच्छी बाल  ...... साथ मे  तिकोनी , कोन वाली आइसक्रीम की तरह दाढ़ी  ...... मोबाईल के एप  तो रोज इंस्टाल और अनइंस्टॉल होते रहते है ।  पार्टी  , भाई गिरी  , सेल्फी  और  सेल्फी विवरण तो वाकई दिल दहलाने और  पढ़ने लायक होता है।  इसके  कुछ उदहारण इस प्रकार है -  छोटे भाई के साथ पैजामा ठीक करते हुए बड़े भाई का सानिध्य प्राप्त करने का अवसर मिला ,  आज बड़े भाई के घर पर उनकी माता की पुण्यतिथि में , पूज्यनीय और परम आदरणीय संभ्रांत बड़े भ्राता जी के साथ एक सेल्फी , आज गांव में चूहामार दवा का वितरण करते हुए , एक कप चाय की प्याली छोटे भाइयों के साथ।  इतना आदर तो अपने सगे भाइयो के लिए नहीं रहता है जितना  इन सेल्फी वाले भाइयो के लिए होता है। 


कुछ सवाल जो इनके क्रोध को बढ़ाते है।  

बेटा क्या कर रहे हो  ? 
सेमेस्टर या परीक्षा में कितने नम्बर आये थे  ?

lndianboysकल किन लफंगो के साथ घूम रहे थे  ?

अभी से स्मार्टफोन की क्या जरुरत है ?          
पढाई क्यों नहीं करते  ?
नौकरी क्यों नहीं करते ?

इससे ज्यादा सवालो को  बर्दाश्त करने की क्षमता इनमे नहीं होती , आगे सवाल पूछे जाने पर अपनी सलामती के जिम्मेदार आप स्वयं है। 

चौराहा संस्कृति  आजकल इनकी  पाठशाला का एक प्रमुख हिस्सा  है। पकौड़ो के ठेले , चाय की दूकान , पान की गुमटी पर इनकी राजनीतिक और सामाजिक समझ का नमूना आसानी से मिल जाता है। 

विभिन्न पार्टियों का झंडा पता नहीं कितने दिन और कितने दिनों का रोजगार  इन्हे सुलभ कराता रहेगा भगवान् ही मालिक है । कम समय में प्रसिद्धि पाने की चाह  में खुद ही बड़ी - बड़ी बाते छोड़ते हुए  बड़ा बनना , लो क्लास वाले लड़को का चश्मा और फैशनेबल कपड़ा पहनकर अमीर दिखना,  चेहरे से मुस्कराहट का गायब होना और अकड़ वाकई देखने लायक होती है। चाल  तो इनकी ऐसी की आप डर के कहीं दुबक जायेंगे, बाद में भले ही इनके बारे में जानने के बाद सीना चौड़ा करते हुए सामने आ जाये।  वैसे ये भी मानते है की फर्स्ट इम्प्रेसन इज लास्ट इम्प्रेसन।  लेकिन गलती से इनको कहीं छेड़ मत दीजियेगा  क्योंकि इनको झुण्ड में बदलते समय नहीं लगता। 

वैसे गजब का हौंसला  और धैर्य है इनके अभिभावकों का  एक बार  " कोटिश धन्यवाद " तो उनको बनता ही है की इतने जिम्मेदार और होनहार नौजवानो को इतने बेहतरीन ढंग से भारतीय संस्कृति और सामाजिकता का पाठ पढ़ाया है। अगर उन्होंने नहीं पढ़ाया तो कहीं ना कहीं पढ़ने तो भेजा ही होगा। 


ram mamndir a political issue


हम राम मंदिर बनवाएंगे  -


ram mamndir a political issue


सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ अभी कुछ दिनों  तक रामलला और उनके पैतृक जन्मस्थान की चर्चा जारी रहने वाली है।  भाजपा पर मंदिर बनवाने का दबाव सरकार बनने के साथ ही शुरू हो चुका था परन्तु उसने गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डालते हुए कोर्ट के निर्णय के सम्मान की बात कही थी।  राजनीति में मुद्दों को समय से पकड़ना और समय से छोड़ने के अलावा मुद्दों को दबाना भी आना चाहिए और साथ में विपक्ष को समय से मुद्दों को छेड़ना  भी। 

एस सी /एस टी   फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर मोदी सरकार द्वारा जहाँ संशोधन कर दिया जाता है वही जनता और भाजपा कार्यकर्ता  इस मुद्दे के लिए भी अध्यादेश की मांग कर रहे है। मुझे तो लगता है जनता को एक नारा और देना चाहिए  - 

                              जो राम का नहीं वो किसी काम का नहीं 



मुद्दे  बनाने के लिए आरएसएस द्वारा  जिस बाबरी मंदिर का विन्ध्वन्श 1992 में किया गया  तथा जिसके  परिणामस्वरूप  होने वाले दंगो में 2000 लोगो की मौत हुई उस मुद्दे पर कही ना कहीं भाजपा पीछे हटते  हुए दिख रही है।  1992 के नायक आडवाणी ने सिर्फ एक गलती की , की पकिस्तान जाकर जिन्ना के जिन्न को जगाकर चले आये और उस जिन्न ने इनके पुरे राजनीतिक कैरियर  को स्वाहा कर दिया।  आरएसएस में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले आडवाणी  जहाँ कट्टर हिंदूवादी नेता की संज्ञा से सुशोभित होते थे वही इस घटना के बाद मजबूत नेता - मजबूत सरकार  के नारे लायक भी नहीं रहे।  जनता भी कहावतों में भाजपा का मजा लेने लगी " राम लला हम आएंगे मंदिर वही बनाएंगे पर तारीख नहीं बताएँगे " . हालाँकि इसी मुद्दे की वजह से  भाजपा 1998 में सत्तासीन हुई और खुद महल में पहुँचने के बाद भी उसके बाद भी भाजपा ने रामलला को त्रिपाल में ही रखा। अभी तक का दौर वह दौर था जब भगवान राम के नाम पर आम जनमानस की भावनावो को वोटबैंक में बदला जा सकता था। 


एक बार फिर पुराने तरीके को नई  चाशनी  में लपेटकर गुजरात दंगे हुए  राजनीति हेतु आम आदमी की तिलांजलि दी गई और उसी  आम जनमानस के अंदर से उसके सरस  हिंदुत्व को हिंसक रूप में जगाया गया।एक नए नायक का उदय देश के राष्ट्रीय पटल पर हुआ नाम था नरेंद्र दामोदर दास मोदी। 

मोदी ने आडवाणी की गलतियों से सबक लेते हुए और कांग्रेस पार्टी का मुस्लिमो के प्रति झुकाव का फायदा उठाते हुए अनेक हिंदूवादी भाषण दिए जिनमे कुत्ते से लेकर कुछ भाषण अत्यंत विवादित भी हुए।  हिन्दुओ को मोदी में एक ऐसे नेता की छवि दिखाई दी जो स्पष्ट रूप से उनका हिमायती था इस कारण अपेक्षा की गई की सरकार बनने के बाद जल्द ही राम मंदिर मुद्दे को सुलझा लिया जायेगा। 

लेकिन कहते है की दूर के ढोल सुहावने होते है।  मोदी सरकार बनने के बाद मंदिर मुद्दे को कोर्ट के पाले में डाल  दिया गया और अन्य  मुद्दों की तरह इसको  उचित समय पर इस्तेमाल करने के लिए छोड़ दिया गया । 
अब आम जनता जब सरकार से उसके चार सालो के कार्यो का लेखा जोखा मांग रही तब इस मुद्दें को एक बार फिर हवा देने की कोशिश की जा रही है यही वजह है की गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के बयान आना शुरू हो चुके है। 
अभी   बयान  में आगे रहने वाले नेताओ द्वारा जनता को उकसाना जारी रहेगा । कुछ फिल्मे आएँगी इस मुद्दे पर , कुछ पेड  उलेमाओ के भी बयान आएंगे , कुछ प्रवक्ता न्यूज़ चैनलों पर मंदिर बनाते दिखेंगे ,  परन्तु उनके द्वारा सरकार से नहीं पूछा जायेगा की मंदिर कब बनेगा ? और सरकार कभी कोर्ट तो कभी सत्ता की दुहाई देती रहेगी और रामलला को उनके बनाये संसार में सिर्फ तारीख पे तारीख ही  मिलती रहेगी पर अपना घर नहीं। 







mission2019



मिशन 2019 


भारतीय राजनीति के सबसे बड़े राजनीतिक युद्ध  का अघोषित सिंघनाद प्रारम्भ हो  चुका है।  भाजपा और कांग्रेस के अतिरिक्त  देश की अन्य तमाम छोटी बड़ी पार्टियां ने  इस युद्ध के लिए प्यादो से लेकर मैदान और सारथी की तलाश में  जाल फैलाना शुरू कर दिया है। 


mission2019


भाजपा मगध की सियासत में अपने मजबूत साझीदार नीतीश कुमार के साथ  बड़ी ही नम्रता से  50 - 50  के सिद्धांत पर झुकती दिख रही है  जिसको भांपते हुए रामविलास पासवान से लेकर कुशवाहा खेमे की बेचैनी साफ़ समझी जा सकती है क्योंकि पिछली बार सीटों के बंटवारे में इन्हे अच्छी स्थिति प्राप्त थी और मोदी चेहरे के साथ संसद में पहुँचने में सफल हुए थे। तब भाजपा  ने भी नहीं सोचा था की उसे इतना प्रबल बहुमत प्राप्त होगा  इस कारण कमजोर और छोटी  पार्टियों से भी समझौता करने में उसे हिचक नहीं हुई  । इस बार चेहरे की चमक फीकी पड़ने के साथ  ही भाजपा को  मजबूत साझेदारों  की आवश्यकता  महसूस हुई जिसका  राजनीतिक लाभ  उसके मजबूत सहयोगियों को मिलना स्वाभाविक है। 


mission2019


कांग्रेस की रणनीति अभी तक मोदी सरकार पर आरोप प्रत्यारोप तक ही सीमित है  2019 को लेकर उसकी नीति अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन उम्मीद के मुताबिक अपने पुराने सहयोगियों को साथ लेकर चलने का प्रयास रहेगा। 


लोकसभा चुनावों से पहले होने वाले राजस्थान , मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनावों  के परिणाम को  2019  का सेमीफाइनल माना जा सकता है । इन तीनो राज्यों में भाजपा की सरकार है और  राजस्थान में हर पांच साल  में सत्ता परिवर्तित होते रहती है।  शिवराज सिंह चौहान की प्रतिष्ठा भी ऐसे समय में दांव पर लगी है जब व्यापम की आंच  अभी तक ठंडी नहीं हुई है और दूसरी तरफ सत्ता विरोधी रुझान। 





तीसरा मोर्चा अभी तक ख्याली  पुलाव की तरह  धरातल पर नहीं आ सका

हालाँकि अगर इसमें  नीतीश कुमार होते तो मामला कुछ दिलचस्प होता अभी भी यदि संगठित होकर बागडोर ममता बनर्जी के हाथो में जाती है तो  नए सम्भावनाओ के द्वार खुल सकते है। क्योंकि बंगाल में लगातार सेंधमारी के बावजूद बीजेपी को निराशा ही हाथ लगी है , हालांकि थोड़े से बढे हुए वोट प्रतिशत और दो - तीन सीटों की विजय पर वह खुद को सांत्वना दे सकती है लेकिन बंगाल और तमिलनाडु ही ऐसे दो राज्य थे जहाँ  2014 में मोदी लहर  बेअसर साबित हुई थी ,इसलिए  इन दोनों  ही राज्यों में भाजपा द्वारा  कुछ नई  तरह की राजनीति देखने को मिल सकती है। 2019  के लोकसभा चुनाव  जयललिता  के बिना उनकी पार्टी के  लिए भी  अग्नि परीक्षा के  समान होंगे  ।


मुलायम के अखिलेश और उनकी बुआ  के वोट बैंक का ध्रुवीकरण 2014  के चुनावों में  बीजेपी अपने पक्ष में करने में कामयाब रही थी , परन्तु पाँच साल बाद इस तरह के मुद्दे दुबारा मतदाताओं की भावनाये  राजनीतिक रूप से वोट में तब्दील नहीं कर सकते। एससी / एसटी  एक्ट में बाजी जरूर बीजेपी ने मारी है परन्तु  अपने परंपरागत ब्राम्हण वोट बैंको की नाराजगी उसे भारी पड़ सकती है।  वहीँ  सवाल यह भी रहेगा की  बसपा के मूल एससी / एसटी  वोटर बीजेपी में अपना कितना रुझान दिखाते है। 

कुल मिलाकर कांग्रेस और भाजपा  के बीच में होने वाला 2019  का मुकाबला  2014  की अपेक्षा काफी अलग है जहाँ  ना अब किसी की लहर है और नाहीं भ्रष्टाचार  का कोई स्पष्ट मुद्दा।  प्रमुख मुद्दा जो रहने वाला है वो है  मौजूदा सरकार का  कामकाज और  2014 में उसके द्वारा किये गए वादे  तथा  वर्तमान परिदृश्य में  दोनों पार्टियों  के प्रधानमंत्री पद के  प्रमुख  उम्मीदवारों की नेतृत्व क्षमता। 




kuchh apni


कुछ अपनी 


गुमनाम रहने की आदत क्यों डालू मैं

जब जमाना ही ख़राब है

होंगे कद्रदान मेरे चेहरे के लाखो

दिल को समझने वाला मिले

कहाँ ऐसे जनाब है

आप चाहते है की ज़माने से छुप जाएँ

हुनर बोलता है हुजूर

यही इस सवाल का जवाब है

कोशिश बहुतों ने की


की हम मशहूर ना हो पाए


इतना आसान नहीं है

की लोग उन्हें जगाने वाले को भूल जाये

अभी तो सफर की शुरुआत हुई है 

कारवां बनाना बाकी है 

दौलत की चाह नहीं मुझको 

आशियाँ दिलो में बनाना बाकी  है 

कब तक रोकेंगे वक़्त के थपेड़े हमें 

अभी तो अपना वक़्त आना बाकी है 


इन्हे भी पढ़े  - 

जिंदगी और हम 

kuchh to log kahenge

कुछ तो लोग कहेंगे 


कुछ लिखूंगा  तो  कुछ  को कुछ होगा

ना लिखूं तो मुझको कुछ होगा
कुछ  तो  बात है  की  कुछ  को  कुछ लिखना अच्छा नहीं लगता
कुछ सच सुनाना  कुछ अपनी तस्वीर सी लगती है
कुछ का नजरे ना मिलाना कुछ सच की जंजीर सी लगती है

कभी कुछ  कम लिखूं तो कुछ अधूरा सा लगता है 

पूरा जो करता हूँ  तो कुछको  अखरता है 


रिश्ते जो कुछ टूट से रहे है 
अपने जो कुछ छूट से रहे है 
कुछ है जो समझ से परे है 
पर्दे में कुछ छेद सा दिखता है 
कुछ के अंदर कुछ भेद सा दिखता है 

कुछ  करने का अंदाज निराला था 
कुछ ना  करने वालो के दिलो में कुछ काला था 
कुछ हमदर्दी जो दिखा दी 
हाथ मदद को कुछ  जो बढ़ा दी 
कुछ दर्द चेहरे पर लोगो  के  छलकेगें 
कुछ तो लोग कहेंगे  


इन्हे भी पढ़े  - लिखता हूँ  


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वो 


पता नहीं क्यों वो लगातार टकटकी लगाए मुझे ही देखते जा रहा था। आज पहली बार ऐसा हुआ की कोई मुझसे लगातार नजरे मिला रहा था। मैंने सोचा की उसको खूब तेज डांट  दूँ  फिर उसकी दुबली काया देखकर उसपर दया आ गई , ऐसा लग रहा था जैसे वह कई दिनों से भूखा है।

मुझे कॉलेज जाने में देर हो रही थी इसलिए मैंने उस पर से ध्यान हटाकर आगे बढ़ने में अपनी भलाई समझी। अभी मैं कुछ दूर ही आगे बढ़ी थी की  वो फिर मेरे पीछे - पीछे आने लगा। आखिर मैं खुद को रोक नहीं पाई  और पास की दूकान से ब्रेड खरीदकर कुछ ब्रेड उसके सामने रख दिए , मेरे सामने दुनिया की एक वफादार नस्ल का जीव था।  जिसे उसकी वफादारी का इतना ही इनाम मिला की  दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी  इंसान ने उसके नाम को गाली बना दिया। 


ब्रेड को उसके द्वारा खाने का अंदाज कुछ ऐसा था  जैसे  वह ब्रेड को ना खाकर बिरयानी खा रहा हो।  ब्रेकफास्ट ख़त्म कर वो फिर से मेरी तरफ ऐसे देख रहा था जैसे लंच और डिनर भी उसे अभी चाहिए।  मैंने भी पूरे  पैकेट को उसके सामने रखने  में देरी नहीं की। 

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कॉलेज के लिए लगातार देर हो रही थी  फिर भी ना जाने क्यों मैं उसको खाता हुआ देख वही रुक गई ।  सम्पूर्ण  खाद्य पदार्थ को अपने उदर में समाहित करने के पश्चात  वो दुम  हिलाता हुआ मेरी तरफ ऐसे देख रहा था जैसे  कोई विद्वान पुरुष मुस्कुरा रहा हो । 

मैं  फिर से एक बार कॉलेज की ओर बढ़ने लगी   अचानक से  कुछ  असामाजिक तत्व जो की आजकल हर गली नुक्कड़ पर प्रतिष्ठित है  ने अपने संस्कारो को दिखाने का प्रयास किया  वैसे मैं इन  सबको सहने की आदि हो चुकी थी परन्तु मेरे पीछे कोई था  जिसे ये सब पसंद नहीं आया और उसने अपनी भाषा में ऐसा प्रतिकार किया की सहसा मुझे भी यकीन नहीं हुआ , अराजकतत्व अपने संस्कारो की पोटली समेत कर इतनी  तेजी से रफूचक्कर हुए की मै देखती रह गई। 

कुछ  मिनटो  की वफादारी का शायद  इससे बेहतरीन उदहारण  इंसान भी नहीं दे सकते ।  मैंने निश्चय कर लिया था की  ऐसे वफादार को अपने हाथ से जाने नहीं दूंगी और मुझे इस बात का भी अहसास हो चुका था की वो भी मुझे नहीं छोड़ने वाला।  मैं एक बार फिर कॉलेज के लिए बढ़ चली और वो एक बार फिर मेरे पीछे - पीछे किसी साये की तरह दुम हिलाता। 



इन्हे भी पढ़े - कहानी  

jati sambodhan


जाति  सम्बोधन 



मैं इतिहासकार होते हुए भी इस तथ्य की ऐतिहासिक समीक्षा नहीं करूँगा , क्योंकि इतिहास की कई परम्पराएं और पद्धतियां आज भी सुचारु रूप से संचालित है जिनमे से कुछ सभ्य समाज के लिए सही है और कुछ गलत। जो सही है और और समाज के लिए आवश्यक है वो तो चलनी चाहिए  परन्तु जो गलत है और समाज में विभेद उत्पन्न करे उसका खात्मा जरुरी है। मेरा मानना है जो आज है वही समाज है।

और आज  समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता और कर्मो के अनुसार सम्माननीय है। हम उसकी जाति  और धर्म को लेकर कुछ भी ऐसा नहीं कर सकते जो शोभनीय नहीं है। मेरे अनुसार तो जाति ही नहीं होनी चाहिए परन्तु यह इतना आसान नहीं है। इसलिए वास्तविकता के धरातल पर आते हुए यह आवश्यक हो जाता है की अगर हमें किसी सभा के बीच या किसी समूह और चर्चा में किसी की जाति का उल्लेख करना भी पड़े तो उस जाति को सम्बोधित "शब्द "  का उच्चारण करते समय हमारे मन में  किसी भी प्रकार की हीन भावना न उत्पन्न हो बल्कि शब्द ऐसा होना चाहिए जिससे उस जाति का पद समाज की अन्य जातियों के सामान ही प्रतिष्ठित हो। इसलिए आवश्यक है समाज से इस दलित शब्द को और यदि समाज के किसी कोने में ऐसे ही और शब्दों का प्रयोग होता हो तो उन्हें भी तत्काल प्रभाव से हटा दिया जाये क्योंकि बुराई का खत्म जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है।  

लेखक के क्वोरा के एक जवाब से उद्धरण 

abhinandan


अभिनन्दन 



कुछ खोज करो हर रोज करो - 3 
जिसने तुमको है जनम दिया -2 

उस माँ का वंदन रोज करो 


कुछ खोज करो हर रोज करो - 2 
है खुद से खुद का ये वचन
पहले तूं है मेरे चमन

इसको नमन हर रोज करो

कुछ खोज करो हर रोज करो - 2

चलता जीवन बहता पानी 
बोलो है कुछ , सब उसकी निशानी 
उससे मैं भी उससे तुमभी 
उससे सारा ब्रम्हांड चले 
उस प्रभु का अभिनन्दन रोज करो 
कुछ खोज करो हर रोज करो 

अक्षर ज्ञान कराया उसने 
जग से परिचय करवाया उसने 
इस अंधियारे मन मस्तिष्क में 
ज्ञान का ज्योत जलाया उसने 
ऐसे गुरु के चरणों को नमन हर रोज करो 
कुछ खोज करो हर रोज करो 



इन्हे भी पढ़े -  ए खुदा तूं ही बता 

kuchh shayari


कुछ शायरी  





इरादे बहुत है वादे  बहुत है कसम से तेरे प्यादे बहुत है
चाहे जितनी भी छलांग लगा लो वादों की
इस मुल्क में नासमझ शहजादे बहुत है



वे रोज रोज कश्तियाँ बदलते फिरते है -2
अभी उन्हें मालूम नहीं है  -2
की छेद है कहाँ पर


कभी दिल्ली आओ तो दीदार हो तुम्हारा  -२
ये सियासत जो तुम खेलते हो
इसमें नकाब अच्छा नहीं होता
आस्तीन तो कइयों ने कटवा दी -२
पर पीछे से जो घुस जाये ऎसे सांपो का जवाब नहीं होता।


मत बोलो इतना की संभालना मुश्किल हो जाये 
अब भी वक़्त है  कभी सच भी बोल लिया करो 

prem

प्रेम 


प्रेम एक लाइलाज रोग है जोकि अँखियों के झरोखे से शुरू होते हुए दिल के दरवाजे को खोलकर ऐसे कोने में घुसकर बैठ जाता है जहाँ से इसे निकालना नामुमकिन है। प्रायः यह रोग कुछ ही लोगो को अपनी चपेट में पूरी तरह से ले पाता है, बाकि इससे मिलते - जुलते अन्य रोग जैसे आकर्षण को ही प्रेम मान बैठते है जिसका इलाज संभव है।
प्रेम रोग से ग्रसित प्राणी प्रेम की प्राप्ति पर इस रोग के अगले दो सम्भावी चरणों में से एक चरण अर्थात सकारात्मक चरण में पहुँच जाता है जहाँ उसे अपने प्रेमी का साथ प्राप्त होता है , जिसके परिणामस्वरूप वह संसार के अन्य कष्टों को हंसकर पार कर जाता है।
दूसरे सम्भावी चरण अर्थात नकारात्मक चरण में पंहुचने पर वह मानसिक सामंजस्य खो बैठता है और कई कष्टों को आमंत्रण दे बैठता है।
बचाव - चूँकि बचाव इसके प्राथमिक चरण तक ही सीमित है यानि किसी से ज्यादा देर तक नैनो से बात करने का प्रयास मत करे साफ़ शब्दों में नैन मटक्का ना करे , वर्ना दिल के अंदर प्रवेश करने पर दुनियां में कहीं इसका इलाज संभव नहीं है।

क्वोरा पर दिए एक जवाब से साभार -

rahul and rafal


राहुल का राफेल राग खतरे में देश 

rahul and rafel


चाहे आप किसी दल या नेता के खिलाफ हो परंतु आप सत्ता के लिये देश की सुरक्षा से खिलवाड़ नही कर सकते . राहुल गाँधी भाजपा पर इस कदर हमलावार हैं की देश की सुरक्षा से ही खिलवाड़ करने पर उतारू हो चुके है . उनको लगता है की राफेल डील मे सरकार ने घोटाला किया है , उनको लगता है की सरकार सुरक्षा पर अहम जानकारिया सार्वजनिक करे जिससे वी चीन और पाकिस्तान को इसकी जानकारी दे सके इसीलिये पाकिस्तान ने उनका समर्थन किया है .


एक पूर्व प्रायोजित साजिश के तहत सरकार को रक्षा डील को सार्वजनिक करने पर मजबूर करना कहा तक उचित है , उसपर से आप विपक्ष मे प्रधानमंत्री के उम्मीदवार भी है क्या होता अगर आप प्रधानमंत्री बन जाते आप तो देश की सुरक्षा को ही ताक पर रख देते और पाकिस्तान और चीन को खुश करने मे कोई कसर नही छोड़ते . अभी तक राफेल मे आप सिर्फ फ़्राँस के पूर्व राष्ट्रपति के बयान को आधार बताते है . आप को मालूम होना चाहिये की वे एक पूर्व राष्ट्रपति होने के साथ ईसाई भी है जो की भारत सरकार द्वारा ईसाई मिशनरियो की फंडिंग और इनके द्वारा भारत मे ईसाईकरण पर लगाम लगाने से क्षुब्ध भी .

राहुल गाँधी आजकल खुद को हिन्दू कहलवाना पसंद करते है लेकिन इसकी जरूरत क्यो आ पड़ी और क्या राहुल गाँधी अपनी और प्रियंका गाँधी की कोई ऐसी तस्वीर भी सांझा करना पसंद करेंगे जिसमे वे  रक्षाबन्धन का पर्व प्रियंका गाँधी के साथ मनाना पसंद करते हो .क्या वे अपने बहनोई का धर्म बताना पसंद करेंगे . जिनके हाथो पर रक्षासूत्र नही दिखता .

राफेल कारगिल युद्ध के बाद से ही सेना के लिये जरूरी माना गया परंतु कांग्रेस सरकार और इसके बिचौलियो ने अपने हित पूरी ना होते देख इसे लंबे समय तक लटकाये रखा और अब जब सेना और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए मोदी सरकार ने इसे अंतिम रूप दिया तो आप उसके पीछे ही प़ड गये . राहुल गाँधी तीन बार राफेल की अलग - अलग कीमते बता चुके है . पहले तो मैं राहुल गाँधी से ये पूछना चाहूंगा की वे ना तो तत्कालीन समय मे प्रधानमंत्री थे और ना ही कांग्रेस के अध्यक्ष फिर उनके पास राफेल की जानकारी कहा से आई और अगर आई भी तो उन्हे इस तरह सार्वजनिक करते हुए क्या वे भारत विरोधी ताकतो की मदद नही कर रहे .

वे बोलते है की भाजपा ने रिलायंस का नाम फ़्राँस को सुझाया था और भाजपा बोलती है की फ़्राँस की कम्पनी का पहले से ही रिलायंस के साथ करार था . अगर भाजपा सही हो तो राहुल गाँधी का क्या ?

कांग्रेस सरकार मे एच ए एल और अन्य सरकारी उपक्रम इनकी कठपुतली मात्र थे जिनसे ये अपनी मंशा पूरी करते थे और इस कारण इन्होने कभी भी तकनीकी रूप से इन्हे इतना विकसित नही होने दिया जितना आज ये इससे अपेक्षा कर रहे है . अगर फ़्राँस की कम्पनी रिलायन्स के साथ पूर्व मे करार कर भी ली है तो इसमे ऐसा कौन सा गुनाह है . आखिर वह भी तो अन्य राष्ट्रो की तरह देश मे रक्षा उपकरणो को बना सकती है ताकि आवश्यकता होने पर और आपात परिस्थितियो मे देश की रक्षा सम्बंधी आवश्यकताओ की पूर्ति की जा सके .

अगर आप को लगता है की मोदी रिलायंस की वफादारी करते है तो आप बता सकते है की केजी बेसिन मे रिलायंस को बढे हुए मूल्य सरकार क्यो चुकाती थी . ऐसे मे मोदी टाटा से करार करते तो भी आप यही कहते, आखिर देश के विकास का बोझ सरकारी कम्पनियाँ कहा तक उठाने मे सक्षम है और आपने इतने सालो मे इन्हे कितना सक्षम बनने दिया आपसे बेहतर कौन जान सकता है .

rahul and rafel

राहुल गाँधी बस राफेल की खामियां गिना दे तो उनकी सारी बातें सही मानी जा सकती है लेकिन अगर एक भी खामी नही गिना पाये तो देश उनसे सवाल जरूर पूछेगा की क्या सत्ता ही उनके लिये सबकुछ है . क्या वे इटली की किसी कम्पनी से सौदा ना किये जाने से खफा है या फिर देश के मजबूत होते रक्षातंत्र से . क्या वे देश मे तेजी से खत्म होते ईसाई मिशनरियो और नक्सलवाद से खफा है या फिर खुद को राजनीति मे स्थापित ना कर पाने से .



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forest politics


जंगल राजनीति 



कौवा चले  हंस की चाल, हंस देख बउराये
शेर खाये घास हरी - हरी , गधा रोज शिकार पर जाये 
मानव  करे नाच झमाझम  बंदरियां देख शर्माए
गिरगिट सब गायब हो गए , नेता रंग बदलते जाये

महंगाई अब  रोज डंसे है , नागिन टीवी पे नाच दिखाए
मगर देख हुए भौचक्का , अब तो राजा  ही  घड़ियाली आँशु बहाये 
कुत्ते हुए भयभीत सब , कंही गाड़ी से कुचल  ना जायें 
देख तमाशा खबरनवींशों  का , भालू भी अचरज खाये

ऊंट बोले मैं लम्बा या कालाधन , जिसे पकड़ ना पाए
घर की रबड़ी खुद ही खा गए , इल्जाम बिल्ली मौसी पे  लगाए
हाथी जैसा हुआ भ्रष्टाचार , जिसे मिटाने आये
खुद ही हो गए फूल के गैंडा ,तुमसे कछु ना हो पाए

लोमड़ी पहने भगवा चोला , साधु ईश्वर से कह ना पाए
तोता बोले राम - राम , तुम भी थे राम का रट्टा लगाए
पूछे गइया चिल्ला के तुमसे , राम का मंदिर काहे ना  बनवाये -


हम जंगल के जीव है सारे , तुम तो मानव कहलाये
सत्ता की खातिर तुम बने जानवर , तुमसे तो अच्छे हम कहलाये 




mediatantra

मीडियातंत्र 


वर्तमान समय में देश की मीडिया एक लाभकारी संस्था बन चुकी है। किसी ज़माने में भारत में अखबार और पत्रकारिता एक घाटे का सौदा हुआ करता था और इसे केवल समाज सेवा हेतु संचालित किया जाता था।  परन्तु आज के दौर में मीडिया एक लाभदायक व्यवसाय का रूप ले चुकी है और कुछ मीडिया संस्थान और पत्रकार सत्ता से करीबी रिश्ता बनाकर खुद को ताकतवर समझने लगे है। जो थोड़े बहुत ईमानदार है वे प्रताड़ना का शिकार है या फिर उनको हाशिये पर डालने का प्रयास जारी है। 



एक जमाना था जब लोग खबरों पर पूर्ण रूप से विश्वास किया करते थे और आजकल खुद के जांचने परखने के बाद ही विश्वास करते है। 

आज मीडिया में इतनी ताकत आ चुकी है की वो मुद्दों को जब चाहे मोड़ सकती है किसी को जमीन से उठाकर आसमान में बैठा सकती है। अभी हाल ही में पकिस्तान द्वारा भारतीय सैनिक नरेंद्र के साथ किये गए व्यवहार से देश में भारी आक्रोश था , तमाम सोशल नेटवर्कींग साइटो पर सरकार को जी भरकर गालियाँ दी जा रही थी,ऐसा लगा की सरकार के प्रति लोगो में गुस्सा अपनी चरम सीमा पर पहुँच जायेगा तब तक मीडिया ने अपना रुख राफेल से लेकर गणेश पूजा में परिवर्तित कर दिया और आम जनता में भरे आक्रोश की हवा निकल गई। 

मैंने अक्सर देखा है मीडिया में आने वाले डिबेट ऐसा लगता है जैसे की पूर्व प्रायोजित होते है।  आप इनके सवाल और कार्यक्रम के शीर्षक देखकर ही बता सकते है की ये किसका पक्ष लेने वाले है सरकार का या सत्य का। मीडिया तो वैसे भी आजकल भारत के सूचना प्रसारण मंत्रालय से संचालित हो रही है।  वहा बैठे पेशेवरों की टीम सारे न्यूज़ चैनलों पर चौबीस घंटे आँख गड़ाए बैठे हुए है। और प्रत्येक चैनल को क्या दिखाना है फ़ोन के द्वारा सूचित कर दिया जाता है। यह बात पुण्य प्रसून जोशी ने भी अपने ब्लॉग में कही है की कैसे सरकार अब मीडिया को नियंत्रित करती है। और सत्ता द्वारा लाभ प्राप्ति हेतु ज्यादातर मीडिया संस्थान इनकी अधीनता स्वीकार भी कर लेते है। सुचना प्रसारण मंत्रालय से ही किस चेहरे को ज्यादा दिखाना है और किस तरह की खबरे चलानी है इसका भी निर्धारण हो जाता है,और जो इनके विपरीत जाता है उसको अपने लहजे में  चेताया भी जाता है। 




ऐसे में सोशल मीडिया ही एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसे पूर्ण रूप से नियंत्रित नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका प्रसार व्यापक है। कोशिश तो इसको भी नियंत्रित करने की होती ही रहती है परन्तु कामयाबी अधूरी ही मिलती है। 

30 मिनट के कार्यक्रम में 10-12  मिनट तो इनके प्रचार में ही निकल जाते है।  उसके बाद कभी  सास बहु की खबरे  जो की उन्ही धारावाहिको की ज्यादा दिखाई जाती है जिन्होंने इन्हे पेमेंट किया होता है, सीरियल के प्रचार का यह अनोखा माध्यम है जिसमे आने वाले एपिसोड को लेकर  दर्शको में जिज्ञासा बनाई जाती है और वह सीरियल खबरों में बना रहता है। नहीं तो कई ऐसे बेहतरीन सीरियल है जिन्हे टीआरपी नहीं मिल पाती। 

कभी ज्योतिष की भविष्यवाणी कभी धन प्राप्ति के उपाय तो कभी आस्था के  नाम पर ना जाने क्या - क्या दिखाते रहते है। पता नहीं ये सब हमारे देश में कबसे खबरों की श्रेणी में आने लगे। 
भारतीय क्रिकेट टीम का फैसला भी इनके एक्सपर्ट न्यूज़ रूम में ही बैठे बैठे कर लेते है। लेकिन अन्य खेलो से इनका अलगाव यह सिद्ध करता है की ये भी टीआरपी हेतु खबरों का चुनाव करते है। बिना टीआरपी वाली खबरे इनके लिए खबरे नहीं होती। 

अभी भी समय है अगर इस देश की मीडिया नहीं जागती तो उसकी विश्वसनीयता के साथ ही उसका अस्तित्व भी संकट में आ सकता है और सोशल मीडिया और इंटरनेट को खबरों का  प्रमुख माध्यम बनते देर नहीं लगेगी। 


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lajja karo sarkar


लज्जा करो सरकार 

lajja karo sarkar


रोक सको तो रोक लो बंधु
ये सरकार तुम्हारी है
जनमत की आवाज है अब तो
बिना काम की  चौकीदारी है

उड़ना - उड़ना छोड़के अब तो
कुछ तो  ढंग का काम करो

क्या रक्खा है जुमलों में अब

जब जनता जान रही है सब
फेंकी थी जो विकास की बातें
बोलो अब करोगे कब

देश - विदेश की रबड़ी खाई
फ़्रांस की खाई रसमलाई
पाक ने दागी सीने पे गोली
निकल सकी ना तुम्हारे मुंह से बोली
अब कितना लहू बहाओगे तुम
पूछे शहीद की माँ हो गुमसुम

56 इंच का सीना लेकर क्या कसमे खाई थी
कुछ तो शर्म करो राजा जी
क्या अपने झूठे वादों पर
तनिक लाज ना आई थी।


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pitrsatta ki utpatti


पितृसत्ता की उत्पत्ति 



यहाँ मैं प्रत्येक तथ्य के विस्तार में न जाकर केवल मूल तथ्य बताने की कोशिश कर रहा हूँ क्योंकि विस्तारित उत्तर कई पृष्ठों का हो सकता है
हम आज समाज में जो भी देखते है , समाज को उस स्वरुप में आने में सदियाँ लग गई।

इसी प्रकार प्रारम्भ में स्त्री पुरुष के बीच रिश्तो का कोई नाम नहीं था , और नाहि सम्बन्धो की कोई सुनिश्चितता । जिससे समाज का कोई स्वरुप निर्धारित नहीं था। इस कारण स्त्री के गर्भवती होने पर कोई पुरुष यह सुनिश्चित नहीं कर पता था की संतान का पिता कौन है ,ऐसी अवस्था में स्त्रियां गर्भावस्था के समय भोजन और अन्य कार्यो हेतु लाचार हो जाया करती थी. क्योंकि उस समय जानवरो का शिकार और कंदमूल का संग्रहण ही आहार के प्रमुख साधन थे। ऐसी अवस्था को देखते हुए और स्वयं की सुरक्षा हेतु स्त्रियों ने पुरुषो का आश्रय लेना शुरू कर दिया और समय व्यतीत होने के साथ इस व्यवस्था को विवाह का नाम दिया गया जिससे पिता की पहचान की जा सके और यहीं से धीरे - धीरे परिवार की अवधारणा ने जन्म लिया।
अब परिवार की देखरेख हेतु पुरुष शिकार हेतु लम्बी आखेट यात्राओं पर कम जाने लगे और उन्होंने अपने आसपास खाली पड़ी जमीन को घेरकर खेती करना प्रारम्भ कर दिया और पशुओ को पालतू बनाना भी। बाहरी जानवरो से सुरक्षा हेतु मनुष्यो ने संगठित होकर झुण्ड में रहना प्रारम्भ कर दिया , ऐसे समय में जब किसी बात पर दो व्यक्तियों में विवाद होता तो झुण्ड से निकलकर एक व्यक्ति उन्हें सुलझाने चला आता इसी व्यक्ति को झुण्ड (जिसे बाद में कबीला कहा जाने लगा) के सरदार की संज्ञा दी गई।
जमीन पर कब्जे को लेकर कबीलो में होने वाले विवादो ने लड़ाइयों का रूप ले लिया और एक कबीला दुसरे पर आक्रमण करके उसे अपनी सीमा में शामिल करता गया जिससे सरदार की ताकत बढ़ने के साथ ही उसे राजा की पदवी दी जाने लगी और इस प्रकार " राज्य" तथा "राजा" शब्द की उत्पत्ति हुई। इस पूरी प्रक्रिया में सत्ता पुरुषो के पास ही रही चाहे वह घर के अंदर हो या बाहर।

इस पूरी प्रक्रिया में स्त्रीयाँ अपनी रक्षा हेतु पुरुषो पर ही निर्भर रही है और उनका कार्य घर की चारदीवारी के अंदर ही रहा । इस कारण प्रारम्भ से ही परुष वर्चस्ववादी मानसिकता बनी रही । बाद के समय में समाज ज्यों - ज्यों विकसित होता गया और परिवार में पुरुष की मृत्यु होने पर या अन्य कारणों से कुछ स्त्रीयो ने घर और परिवार की जिम्मेदारी जिस तरीके से आगे बढ़कर निभाई, परिवार ने आगे चलकर परिस्थितियों को समझते हुए उस स्त्री का नेतृत्व स्वीकार किया।ऐसी जगहों पर मातृसत्तात्मकता समाज का निर्माण हुआ। समाज के सभ्य स्वरुप ने स्त्रियों को कई अधिकार दिए , लेकिन यह अधिकार भी पुरुषो द्वारा ही दिए गए थे जोकि हर काल में समाज में होने वाले धार्मिक और सत्ता के उतार चढ़ाव के कारण घटते बढ़ते रहते थे। यही कारण है की समाज के मूल में पितृसत्तात्मकता बसी हुई है।

आज संसार भर में विभिन्न क्षेत्रो , परिस्थितियों और समाज की मानसिकता के अनुसार कहीं पितृसत्तात्मक समाज है तो चुनिंदा जगहों पर मातृसत्तात्मक भी .

क्वोरा पर लेखक द्वारा दिए गए जवाब से साभार -

akhir kab tak


आखिर कब तक  ?

akhir kab tak



जुमलों के सरकार कुछ तो जुमला बोल दो 


मर रहे है वीर सैनिक 
अब तो जुमला छोड़ दो 
56 इंच में गैस भरा है 
या भरी है दूध मलाई 
हम कैसे अब सब्र करे जब

सीमा पर मर रहा है भाई 

मिल लो गले नापाक के अब 
जिसने आँख निकाली है 
कुछ तो बतला दो झांक के अब 
सीने में कितनी बेशर्मी डाली है 
कैसे कायर हो तुम, कैसे ना कहे तुम्हे निकम्मा 
टुकड़ो में बेटे को पाकर क्या कहेगी तुमको उसकी अम्मा 
नहीं चाहिए ऐसा नेता 
ना मांगे भारत माँ ऐसा बेटा 
जो जुमलों से सरकार चलाये 
और मौका पड़ते ही पीठ दिखाए 


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abki baar nahi chahiye aisi sarkar


अबकी बार नहीं चाहिए ऐसी सरकार 


खेलावन के लइका और खेलावन दोनों ही भन्सारी  की दुकान से एक एक थो पान  चबाते हुए चले आ रहे थे।  सामने मोदी सरकार का एक थो पुराना पोस्टर लगा था जो  की सन 2014 से ही तमाम दुश्वारियाँ सहते हुए राहुल गाँधी की तरह टिका हुआ था।  पोस्टर पर मोदी जी का विनम्र चेहरा और एगो  स्लोगन लिखा था " बहुत हुई महंगाई की मार अबकी बार मोदी सरकार " . और उसीके के नीचे लिखा था " अच्छे दिन आने वाले है ".


                  abki baar nahi chahiye aisi sarkar


खेलावन के लइका   - का बाउ जी मोदी जी को देखे है हमको देखके कितना मुस्कुरा रहे है।
खेलावन - गदहा को देख के मुस्कुरायेंगे नहीं तो का करेंगे बुरबक।  इ मोदी भी पूरा जनता को अपने जादू से बकलोल बनाये है।  जौन  चीज परदे पर  दिखाए है पीछे देखने पर पता चला की जादूगर के हाथ की सफाई की तरह इनके  मुंह की सफाई थी। 

खेलावन के लइका  - का कहते है बाउ जी अब ई पोस्टर देख के कंट्रोल नहीं होता और इ पनवो कही न कही विसर्जित करना है।

खेलावन - रहे द बुरबक अगवा ए से बड़ा पोस्टर है जिसपर लिखा है "बहुत हुआ नारी पर वार  अबकी बार मोदी सरकार  "  उहें  मुंह खाली कर देना।

abki baar nahi chahiye aisi sarkar


खेलावन के लइका -  बाउ जी ई  का हमारे अच्छे दिन आ गए। 

खेलावन - आहि न गए है बुरबक टैक्स पे टैक्स बढ़ा है खेत में पानी देंवे पे डीजल बढ़ा है। यूरिया का दाम बढ़ा है।  बैंक में कम पैसा पे जुर्माना बढ़ा है , इहे न गरीबी का मजाक है। एक रूपये में बीमा है लेकिन बैंक में पैसा कम      होने पे वो से बेसी जुरमाना है। इहे  न खेल है जादूगर का। हम कर्जा ले त खेत नीलाम हो जाई और माल्या ले   त   नाम हो जाइ। 

खेलावन के लइका पोस्टर पर पिचकारी मारते हुए आगे बढ़ता है और कहता है की " हमारे अच्छे दिन ना आये तो 2019 में   उनके भी ना आने देंगे ". 


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tera yu jana

तेरा यूँ जाना 

tera yu jana


कभी दिल की  गहराइयों में उतर के देखो 
तेरी ही याद बहती है 
तू नहीं है फिर भी 
तेरी ही बात रहती है 
अकेला हूँ तेरे बिन अब तो,बस यही फ़रियाद रहती है 
उसी जन्नत में चला आऊं 
जहाँ तूं मेरा इन्तजार करती है 

तुझ संग दिए दिवाली के, तुझ संग होली की रंगत 
तुझ संग पीड़ा दिल की बाँटू, तुझ संग सुन्दर ये जगत 

बिन तेरे सुना दिल का झरोखा ,तेरे बिन  सुनी दिल की गलियां 

सुना पड़ा है दिल का बागीचा ,खिलने से मना  करती है बिन तेरे कलियाँ 

लाख तसल्ली देता हूँ, इस दिल को लेकिन 
बिन तेरे इसको अब चैन कहाँ 
क्या खुद को तसल्ली दे पाउँगा 
हर पल भींगे है नैन यहाँ 

है लाख समंदर गहरा तो क्या 
बुझा  पाता  प्यास नहीं 
है सारा जग कहने को अपना 
बिन तेरे किसी से अब आस  नहीं 

मैं तो तेरे बिन अधूरा 

खुद को जिन्दा कह पाता नहीं 
कोई कितना भी समझाये 
तुझ बिन रह पाता नहीं 

चल रही है धड़कन न जाने क्यूँ बेवजह  
अब तूँ ही बतला तू  मिलेगी किस जगह  


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indian political future

भारत के राजनीतिक भविष्य के बारे में आपके क्या विचार हैं?


"भारत का राजनीतिक भविष्य उज्जवल है" आप सोच रहे होंगे की वर्तमान समय के नेताओ को देखकर यह कैसा कथन है। परन्तु शायद आपने सिक्के का दूसरा पहलु अर्थात इस देश की जनता की बढ़ती राजनीतिक समझ की तरफ ध्यान नहीं दिया। आपने देखा होगा की कैसे इस देश की जनता ने अपने उज्जवल भविष्य हेतु एक राजनीतिक नौसिखिये (अरविन्द केजरीवाल ) को उम्मीद से बढ़कर समर्थन दिया, कैसे गठबंधन की सरकारों के दौर में देश को आगे ले जाने हेतू पूर्ण बहुमत की सरकार केंद्र में बनवाई , जोकि सर्वसमाज की एकता के बिना असंभव था। यह बात जरूर है की यह जनता इन्ही के द्वारा छल का भी शिकार हुई है, परन्तु इसने मौका मिलते ही छल का भी बदला लिया। सोशल मीडिया पर आम जनता द्वारा (पार्टियों की आईटी सेल द्वारा प्रायोजित टिप्पणियों को छोड़कर ) टिप्पणियों में उसकी बढ़ती राजनीतिक समझ को देखा जा सकता है। 

जब आप खुदके प्रति जागरूक होते है तब आप को कोई बहका नहीं सकता जैसा की भारतीय वोटरों के साथ होता आया है। और जनता की इसी राजनीतिक समझ के कारण धीरे - धीरे राजनीतिक पार्टियों को अपने चेहरे में बदलाव करना जरुरी हो जाता है। जो खुद को दुसरे से ज्यादा स्वच्छ और ईमानदार सिद्ध करता है ( नाकि बताता है ) जनता उसको जरूर आगे बढाती है। हाँ अभी जनता में जहाँ - जहाँ शिक्षा का अभाव है वहाँ थोड़ा समय अवश्य लगेगा।
आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति में जनता द्वारा ही बदलाव होंगे और आम आदमी के बीच से ही नए नेतृत्व निकलकर राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होंगे और इस देश को उन्नति के शिखर पर लेकर जायेंगे।

लेखक द्वारा हिंदी क्वोरा पर एक सवाल का जवाब से साभार -

hindi diwas kyo ?

हिंदी दिवस 


हिंदी तूं खतरे में है 
सुना है बाबू को तुझे जुबां पर लाने  में शर्म लगती है ,कल को तुझे अपनी मां बताने में शर्म लगेगी।  शाहरुख़ के डायलॉग से प्यार है पर तुझसे नहीं।  तेरी गीतों पर नाचेंगे , तन्हाई में उन्हें गुनगुनायेंगे , शायरियो में दिल का हाल बताएँगे पर बोलने से हिचकिचाएंगे।  

तेरा स्तर  वे गिराते चले जाते है जो तुझे अपना बताते थे , तेरा मान वे बढ़ाने चले आते है जिन पर तेरी ममता की छाँव नहीं। अंग्रेजी हो गए है हम हैलो , हाय , गुड मॉर्निंग से शुरुआत करते है पिता को डैड और दोस्त को डूड कहकर बात करते है।  माँ तो मोम हो गई मोबाइल भगवान हो गया वक़्त से पहले ही अंग्रेजी पढ़कर लड़का जवान हो गया। 

अंग्रेजो की अंग्रेजी हमें अंग्रेज बना रही है और हिंदी इस रिश्ते का मोल चुका रही है। हिंदी दिवस मनाना पड़ता है साल में एक दिन बेटे का फर्ज निभाते हुए अंग्रेजी में मुस्कुराना पड़ता है। 

tera intjaar

तेरा इन्तजार 

tera intjaar



बड़ी हसरत से तुझे देखे जा रहा था
वो बाजार में चूड़ियों को पहनते हुए तेरी खिलखिलाहट भरी हंसी
एक अजीब सी चुलबुली ख़ुशी मेरे दिल ने महसूस की
लगा की बस तू ही तू है इस जहाँ में मेरा सबकुछ

सोचा कदम बढ़ाऊ तो कैसे
मुहब्बत का पंछी उड़ाउँ तो कैसे
चारो और गिद्ध रूपी पहरेदार जो थे
पर साथ में मेरे कुछ वफादार भी थे

पैगाम पहुंचा जब मेरा  तुझतक
यकीन तो तेरी नजरो ने ही दिला दिया था
आता संदेशा तेरा जबतक
कभी तो अपने होंठो को हिला दिया होता
अपने लबो से भी कुछ फरमा दिया होता


हम तो तसल्ली कर लिए होते
कम से कम इस दिल को तो थोड़ा फुसला दिया होता
ये इश्क़  का रोग लाइलाज नहीं होता मेरी जान
बस तूने एक बार आवाज तो दिया होता

कुछ वक़्त बदला, कुछ बदले तेरे तेवर
कुछ हमने भी खुद को बदला
ना बदल सके तो इस दिल में तेरे कलेवर 


अभी भी इन्तजार तेरा करते है 

इश्क़ की गली में लोग ऐतबार मेरा करते है 
तू डरती है ज़माने से तो डरा कर 
अभी भी तेरे नाम पर पैमाने भरा करते है 

बड़ी कातिल थी तेरी निगाहें 
कम्बख्त दिल को भी ना छोड़ा 

तेरे इन्तजार में निकली दिल से आंहे 

दौड़ा न सका अपनी मुहब्बत का घोडा 



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