भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी को नम आँखों से श्रद्धांजलि

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news channel debate

न्यूज़  चैनलों पे होने वाली डिबेट  और उनकी प्रासंगिकता news channelo pe hone wali debate  aur unki prasangikta-



इधर कुछ दिनों से समाचार चैनलों या मीडिया पर विभिन्न मुद्दों को लेकर होने वाली बहस जिसे डिबेट कहा जाता है  एक आम बात होती जा रही है। हम देख सकते है की किसी मुद्दे को लेकर विभिन्न पार्टियों , संगठन या उस मुद्दे से सरोकार रखने वाले किसी विशिष्ट व्यक्ति को चैनल के स्टूडियो में आमंत्रित किया जाता है और उनसे उस मुद्दे पर बहस करवाई जाती है।  

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अगर मुद्दा राजनीतिक हो तब आप देख सकते है की इन राजनीतिक दलों  द्वारा  होने वाली डिबेट कैसी होती है। कभी - कभी  तो मुझे लगता है की ये सारे डिबेट पूर्व प्रायोजित होते है यहाँ पूर्व प्रायोजित का मतलब है की डिबेट किस दिशा में ले जानी  है।  मैंने अक्सर देखा है की अगर न्यूज़ चैनल सत्ताधारी दल या किसी अन्य दल से जुड़ाव रखते है तो उनके सवाल ही ऐसे होते है जिनका जवाब सिर्फ विपक्ष के लिए नकारात्मक होता है वे विपक्षी दल के प्रवक्ता  को अपनी सवालो के जवाब में उलझा कर रख देते है इसीलिए राजनीतिक दल भी न्यूज़ चैनल की प्रतिष्ठा , एंकर और विपक्षी प्रवक्ता की काबिलियत  के अनुसार ही  अपने प्रवक्ताओं को भेजते है  ।

 चैनल भी चाहते है की डिबेट में शामिल व्यक्ति ऐसा हो जो की  उनके चैनल की  trp  बढ़ाने  में सहायक हो।  ये एंकर भी बड़े चतुर होते है पूरी डिबेट का रुख  अपने अनुसार मोड़ने में सक्षम होते है। इसके लिए विपक्षी प्रवक्ता को कम  समय देना उनकी बात पूरी होने से पहले अपना एक घुमावदार सवाल उनके सामने रख देना उनके आंकड़ों और तथ्यों के साथ अपने आंकड़ों और तथ्यों को बताना जिससे उनकी बात सही होते हुए भी उसकी दिशा बदल जाती है और यदि प्रवक्ता भी चालू हुआ और अपनी प्रभावशाली बात रखते चला गया जो उनके लिए हितकर नहीं है तो कुछ नहीं हुआ तो अंतिम अस्त्र बात को काटते हुए विज्ञापन चला देना। कुछ ऐसे दांव पेंच है जोकि मुझे लगता है की एक परिपक्व दर्शक वर्ग अब समझने लगा होगा।  लेकिन यदि  दर्शक की किसी दल या उसके नेता के प्रति  निष्ठां है तो उसको ये सारी डिबेट अपने अनुकूल या प्रतिकूल भी लग सकती है। अनुकूल लगने पर वो खुश होता है और प्रतिकूल लगने पर भी वह पूरी डिबेट को ध्यान से सुनता है जिसमे की वो कमियां निकाल  सके। ऐसे ही दर्शक वर्ग से मिलने वाली trp को ध्यान में रखकर ज्वलंत और  भावनात्मक मुद्दों पर  डिबेट कराई जाती है. जिसमे डिबेट में शामिल मुद्दे से शुरू हुई बहस की  नौबत तू - तू , मैं - मैं  और व्यक्तिगत मुद्दों तक आ जाती है। और असल मुद्दा कही गायब सा हो जाता है।   


अब बात आती है सामाजिक मुद्दों को लेकर होने वाली डिबेट की।  इन मुद्दों पर होने वाली डिबेट की तो हद ही हो जाती है बहस में ऐसे विचार निकल कर सामने आते है जो की कही से आम  सामाजिक  विचारधारा से मेल नहीं खाती  . और किसी न किसी बात पे नए मुद्दे को जन्म दे देती है.
मुझे लगता है की आने वाले दिन क्या वर्तमान समय में ही जनता का इन डिबेट से मोहभंग होते जा रहा है क्योंकि सारे चैनलो पर इस तरह की डिबेट आम होते जा रही है। एक ही प्रवक्ता कई चैनलो पर दर्शको का टाइम जाया करते हुए मिल जाते है. और इन डिबेटोँ  में सच कही पीछे रह जाता है  . 



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