indian rail a journey


भारतीय रेल एक सुहाना सफर 


शादियों के इस मौसम में यदि किसी ने भारतीय रेल का मजा न लिया हो तो मजा कुछ फीका हो जाता है। ऐसे ही एक शादी में मुझे लौटते समय भारतीय रेल की वो सुखद अनुभूति हुई जो अधिकांश भारतीय सालो से करते आ रहे है। 


यात्रा थी बनारस से गोरखपुर के बीच की बहुत ही छोटी सी और संक्षिप्त यात्रा।  सर्वप्रथम तो यह बता दूँ की यह वही बनारस है जो हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी का संसदीय क्षेत्र है और जहा की जनता उन्हें आज भी उनके किये वादो के लिए ढूंढ रही है पर उन्हें विदेश यात्राओं से फुर्सत हो तब वे देश की कुछ सुध ले सके खैर वे सुध क्या लेंगे जहाँ वे कहते है की वे वी आई पी कल्चर को नहीं मानते और गाड़ियों पर से बत्तिया हटा दी गई है वही एक बार उनके आगमन के समय मैं bhu कैंपस में ही था जहाँ सड़को पर बैरिकेटिंग के माध्यम से आम जनता की गाड़ियों को घंटो रोक दिया गया यहाँ तक की एम्बुलेंस सेवाओं को भी। इसलिए बनारसवासी 2019 के चुनावों का इन्तजार कर रहे है। ताकि कही वे दिखलाई दे। 


हा तो बनारस की सड़को पे कूदते फांदते (क्योंकि वहा  की कोई भी सड़क समतल नहीं ) हम पहुंचे मंडुआडीह स्टेशन ट्रेन थी मंडुआडीह - गोरखपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस चूँकि ट्रेन में चढ़ने से पहले टिकट लेना आवश्यक था इसलिए टिकट लेने खिड़की की और चल पड़े।

 वहा पहुंचा तो देखा की टिकट खिड़की से शुरू लाइन दीवार ख़त्म होने के बाद घूमकर u  आकार में लगी हुई थी सोचा जाना तो जरुरी है और दोपहर तक कोई ट्रेन भी नहीं है इसलिए हम भी लाइन में लग गए। अभी ट्रेन खुलने में एक घंटा का समय बाकि था सोचा टिकट मिल ही जाएगी। परन्तु लाइन थी जो खिसकने का नाम ही नहीं ले रही थी आगे देखा तो बगल से काफी महिलाये लगी हुई थी और पीछे उनके घर वाले कुछ ऐसे लोग भी थे जो खिड़की पे सीधे जाके  अपना रौब दिखाते हुए टिकट लेने की कोशिश कर रहे थे और हम पीछे वाले पीछे ही रह गए। खैर तभी सूचना मिली की ट्रेन चलने वाली है इस कारण कई लोग काउंटर छोड़ कर ट्रेन पकड़ने निकल लिए   अवसर देखकर हम भी  टिकट के लिए डटे  रहे  और   टिकट लेने में कामयाब रहे। 
indian railway
अब बारी थी ट्रेन के अंदर  घुसने की जिसपर  दरवाजे तक लटकने वालो की अच्छी संख्या थी  जुगाड़ पद्धति के द्वारा आपातकालीन खिड़की से ट्रेन में प्रवेश करने में  कामयाब हुए। अंदर का नजारा और मुर्गे के बाड़े में कोई विशेष अंतर नहीं था बाहर भी कई लोग ऐसे थे जिनसे अब सुपाड़ी न कूची जाये और वे दरवाजे पे बाहर की ओर अपनी जान जोखिम में डालकर  लटके हुए थे।   
   
कभी सोचता हूँ सरकार की मोटर साइकिल पर तीन सवारियों पर ओवरलोडिंग में   चालान काटती है  परन्तु इसका क्या। 

खैर ट्रेन अपने निर्धारित समय से प्रारम्भ स्थान से ही खुलने में दो घंटे ले लेती है। और लोग अंदर  राहत की सांस लेते है। वैसे राहत के नाम पर बस एक दुसरे के ऊपर चढ़े लोग स्टेशनो का नाम  बताने और पूछने  में मशगूल थे। आने वाले स्टेशनो पर ट्रेन के अंदर घुसने के लिए होने वाली  धक्कामुक्की और न घुस पाने  वाले बेबस चेहरे ही थे। बाकि बहुत से नज़ारे ऐसे थे जो सोचने पे मजबूर करते थे की क्या वाकई हमारी सरकार हमें इंसान समझती है या वोट देने वाले जानवर। 


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