हर पिता मर्द होता है...

 हर पिता मर्द होता है...


पिता पता थे ये बात पता थी

किया कुछ भी न था लेकिन खता थी

बिना बताए भी बीच राह में कोई क्या जाता है?

चले गए वो जहां से लौट न कोई आता है


डाकिया के लिए अब नाम नया है

आने वाले हर पैगाम में प्रणाम नया है

अगर रिश्तों पर यकीन हो तो समझ आएगा

बिना पिता के दुनिया का कोई भी मुकाम क्या है?


वक्त ने दीवार को छत बना दिया -२

कच्ची उम्र में ही कद बढ़ा दिया

नींद में सुकून अब उतना ही है

पांव में छालों के बीच जगह जितना भी है


सुनाने की जगह अब सुनने लगे हैं

राशन और दवा के खर्चे गिनने लगे हैं

अब सपने अपने नहीं रहे

और अपने भी अपने नहीं रहे


मन अब उदास नहीं रहता

शायद किसी के पास नहीं रहता

दिल भी अब कुछ संभल सा गया है

चढ़ता हुआ दिन अब ढल सा गया है


पिता कहते थे कद्र जाने के बाद पता चलती है

खामोशी भी कारवां गुजर जाने के बाद पता चलती है

जो नहीं पता चलता वो अपना ही दर्द होता है

कंधों पर अपने घर संभालने वाला ही

असली मर्द होता है...


- रोहित राय



Bihar Elections 2025: The heartbeat of democracy and the role of the vote

बिहार चुनाव 2025: लोकतंत्र की धड़कन और मतदाता की भूमिका



बिहार चुनाव 2025 की ताज़ा जानकारी, मुख्य मुद्दे, और लोकतंत्र में मतदाता की अहम भूमिका। जानिए क्यों आपका वोट राज्य का भविष्य बदल सकता है।

बिहार चुनाव: लोकतंत्र की धड़कन

बिहार चुनाव: लोकतंत्र की धड़कन बिहार चुनाव एक जीवंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जो राज्य की दिशा और विकास का निर्धारण करती है। इस चुनाव में सभी क्षेत्रीय जनजीवन, सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, और युवाओं के रोजगार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे प्रमुखता से उठते हैं। चुनाव समितियों,यों जनप्रतिनिधियों, यों और नागरिकों की भागीदारी से यह सुनिश्चित होता है कि हर वर्ग की आवाज़ राज्य की नीतियों में शामिल हो। 

मतदान का महत्व

मतदान केवल काग़ज़ पर एक चिह्न नहीं है; यह लोकतंत्र की मजबूत नींव है। जब हर वयस्क मतदान करता है, तो वह न केवल अपने अधिकार का प्रयोग करता है, बल्कि सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी सक्रिय भागीदार बन जाता है। चुनाव अभियान के दौरान विभिन्न दलों के घोषणापत्र, रैलियाँ, पोस्टर और जनसभाएं युवा और महिला मतदाताओं को राजनीतिक रूप से जागरूक बनाती हैं। बिहार की विविधता—भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक—चुनाव की रंगीनता को और भी जीवंत बनाती है। यहाँ मतदाता जाति, धर्म, और क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे सार्वभौमिक मुद्दों पर मतदान करते हैं। 

चुनावी माहौल और जागरूकता

चुनावी प्रक्रिया में ईवीएम, मतदाता सूची जनजाति सूचियाँ और चुनाव आयोग की पारदर्शिता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अंततः , यह चुनाव लोकतंत्र की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है—यह हमें याद दिलाता है कि सत्ता जनता की है और विकास का मार्ग केवल सामूहिक भागीदारी से संभव है।


बिहार चुनाव 2025

बिहार विधानसभा चुनाव

बिहार में मतदान

लोकतंत्र और चुनाव

मतदाता की भूमिका

करतार सिंह सराभा एक भूला हुआ नायक

 करतार सिंह सराभा



15 अगस्त 1947 की वह सुबह पूरे भारतवासियों के लिए न केवल आजादी के खूबसूरत एहसास से भरी थी, बल्कि दिलों में एक कसक लिए हुए भी थी, जो था तमाम अपनों को इस लड़ाई में खोने का गम। देश पर दी गई लाखों कुर्बानियों के उस लक्ष्य को पूरा होते देखने की खुशी में नम हुई आंखें यह समझ ही नहीं पा रही थीं कि यह आजादी हमने ना जाने ही कितने अपनों की शहादत के बाद पाई है। सालों से चली आ रही इस जंग में न जाने कितने ही भारत मां के लाल शहीद हुए, तो कितनों ने अपनी जवानी देश के नाम कुर्बान कर दी। कई नाम तो ऐसे हैं जिनकी शहादत के किस्से ही हम नहीं जान पाए, वे गुमनाम नाम आज भी अपनी पहचान के मोहताज हैं. लेकिन आज हम आजादी के दीवाने की एक ऐसी ही कहानी आप से कहने जा रहे हैं जिसने केवल 19 साल की उम्र में उस मौत कोे हंसते हुए गले लगा लिया था, जिसका नाम सुनकर अच्छे अच्छों की रूह कांप जाती है।

नाम था करतार सिंह सराभा, उम्र थी 17 साल मात्र जब वे आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। आजादी के इस नायक का जन्म 24 मई 1896 को पंजाब के लुधियाना जिले के सराभा गाँव में हुआ था। करतार सिंह की माता का नाम साहिब कौर और पिता का नाम मंगल सिंह था। दुखों का पहाड़ तो इन पर तभी टूट पड़ी था जब बहुत ही कम उम्र में पिता का साया इनके सिर से उठ गया। ऐसे में उनकी परवरिश उनके दादा बदन सिंह ग्रेवाल ने की। बहुत जल्द उनके दादा को समझ में आ गया कि ये वो तोप का गोला है, जो पूरी अंग्रेजी हुकूमत को तहस-नहस कर सकता है। अपने शहर लुधियाना में आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने के बाद करतार अपने चाचा के यहां उड़ीसा चले गए। लेकिन कहानी में मोड़ तो तब आता है जब उन्हें आगे की शिक्षा के लिए 1912 में बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय भेजा जाता है। हालांकि वहां पर उनके दाखिले को लेकर कुछ मतभेद मिलते हैं। लेकिन यही वह जगह थी जहां उनके मन में भारत मां की आजादी का बीज अब पनपने लगा था।

कहते हैं कि यहां उन्होंने एक मिल मजदूर के रूप में भी काम किया था। यह वह दौर था जब विदेशों में भी कई जगह भारतवंशियों के साथ जुल्म किए जा रहे थे। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी भारतीय मजदूरों के पर अत्याचार अब बढ़ता ही जा रहा था। करतार अपनी आंखों के सामने भारतीय श्रमिकों के साथ हो रहे इस अन्याय को देख न सके और उनके लिए पूरे जोर शोर से आवाज उठाने लगे।

साल था 1913 की और 15 जुलाई की वह ऐतिहासिक तारीख थी जब भारत की आजादी का सपना आंखों में लिए विदेशी धरती पर  लाला हरदयाल, संत बाबा वासाखा सिंह दादेहर, बाबा ज्वाला सिंह, सोहन सिंह भकना और संतोख सिंह ने अमेरिका के कैलिफोर्निया में गदर पार्टी की स्थापना की। इस पार्टी का मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को में बनाया गया। अंग्रेजों की गुलामी से हिंदुस्तान को आजाद करने के लिए इस संगठन के लोग अब एक कदम आगे बढ़ते हुए हथियार उठाने को तैयार हो गए। ऐसे में करतार सिंह सराभा भी कहां चुप बैठने वाले थे, भारतीयों पर हो रहे जुल्म ने इस युवा को झकझोर कर रख दिया था। वे भी गदर पार्टी के सक्रिय सदस्य बन आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। गदर पार्टी के सह-संस्थापक सोहन सिंह भकना ने अमेरिका जाने से पहले  भारत में भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रखे थे, उनकी इस वीरता ने अमेरिका में रहने वाले सिखों के लिए देशभक्ति की अलख जगाने का कार्य किया।


करतार सिंह सराभा की मुलाकात भी सोहन सिंह भकना से हुई। हालांकि, दोनों की उम्र में एक बड़ा फासला था लेकिन, करतार के उपर उनके विचारों का काफी प्रभाव पड़ा। गदर पार्टी ने लोगों के बीच अपनी आवाज पहुंचाने और उन्हें जागरूक करने के लिए 1 नवंबर 1913 को ‘द गदर’ नाम से अपना अखबार कई भाषाओं में निकालना शुरू कर दिया। जल्द ही पंजाबी के अलावा हिंदी, उर्दू, बंगाली, गुजराती और पश्तो भाषाओं में इसका प्रकाशन होना शुरू हो गया। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को से निकाले जा रहे इस अखबार के पहले अंक में ही करतार सिंह ने अपने इरादे जता दिए थे।

अखबार ने जहां मास्टहेड पर कैप्शन दिया: अंग्रेजी राज का दुश्मन, वहीं करतार सिंह सराभा ने पहले अंक में लिखा:

"आज विदेशी धरती पर 'ग़दर' शुरू हो रहा है, लेकिन हमारे देश की भाषा में ब्रिटिश राज के खिलाफ़ युद्ध शुरू हो रहा है। हमारा नाम क्या है? ग़दर।
हमारा काम क्या है? ग़दर।
क्रांति कहां होगी? भारत में।
वह समय जल्द ही आएगा जब राइफलें और खून कलम और स्याही की जगह ले लेंगे।" जल्द ही करतार सिंह के तत्वावधान में अखबार का गुरुमुखी संस्करण भी छपने लगा। अखबार में उनके लिखे देशभक्तिपूर्ण लेख और कविताएँ किसी बम गोले से कम नहीं थीं।

उस दौर में इस तरह की बातें करना किसी दिलेरी से कम नहीं थीं। क्योंकि पकड़े जाने पर कठोर सजा दी जाती थी। वहीं करतार सिंह ने अब इससे आगे बढ़ते हुए अपनी लड़ाई को धार देने के लिए हथियारों की ट्रेनिंग भी लेनी शुरू कर दी। इसके अलावा उन्होंने बम बनाना और हवाई जहाज उड़ाना भी जल्द ही सीख लिया। इतनी कम उम्र में जब आज के किशोर अपनी कॉलेज लाइफ से अलग हटकर नहीं सोच पाते वहीं करतार सिंह ने वो काम करने शुरू कर दिए थे, जिन्हें बड़े-बड़े भी सपने में करने की हिम्मत उस दौर में नहीं रखते थे।

भारात में अंग्रेजों के अत्याचार देखते हुए जल्द ही गदर पार्टी ने आजादी की जंग भारत में शुरू करने की योजना बनाई और 1914 में अमेरिका छोड़ ज्यादातर सदस्य भारत चले आये। एक बार फिर अपनी बात अखबार के जरिए जन-जन तक पहुंचाने के लिए उसकी हजारों प्रतियां शहर से लेकर गांव तक बांटी गई। इसी दौरान करतार सिंह की मुलाकात रासबिहारी बोस से भी हुई। भारत आते ही करतार ने अपनी टीम बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ छोटी-छोटी लड़ाईंयां शुरु कर दीं।

वहीं 25 जनवरी 1915 को हुई पार्टी की एक बैठक में बड़ी जंग का ऐलान किया गया। इस जंग का केंद्र था अमृतसर औऱ तारीख थी 21 फरवरी की. लेकिन पार्टी के ही कुछ गद्दारों के चलते अंग्रेजी हुकूमत को इस योजना भनक लग गई और करतार सिंह समेत कई स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जो इस संग्राम में शामिल होने के लिए अपनी कमर कस चुके थे।
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अंग्रेजों की अदालत ने ग़दर पार्टी के 291 स्वतंत्रता सेनानियों को दोषी ठहराते हुए उनमें से 42 को फाँसी की सजा दी और 114 को आजीवन कारावास की। वहीं बाकि बचे हुए 93 लोगों को अलग-अलग अवधि की कैद की सजा मिली और 42 को इस मुकदमें से आजाद कर दिया गया।

वहीं करतार सिंह सराभा ने तो अदालत में देशद्रोह के तमाम आरोपों को स्वीकार करते हुए सारा दोष ही अपने ऊपर ले लिया, जबकि उनकी कम उम्र और भोले भाले चेहरे को देखकर जज भी उन्हें फांसी की सजा नहीं देना चाहता था। लेकिन कहते हैं न कि रगो में जब देशभक्ति का खून बहने लगता है तो वतन के लिए फांसी का फंदा भी फूलों का हार लगने लगता है। 16 नवंबर 1915 को देश का यह देश का यह लाल केवल 19 वर्ष की आयु में लाहौर की सेंट्रल जेल में फाँसी के फंदे को गले लगा सदा के लिए अमर हो गया।
 
कहते हैं कि फांसी के फंदे को चूमने से पहले करतार सिंह सराभा ने ये देशभक्ति कविता भी गाई थी...

सेवा देश दी जिन्दारिये बड़ी औखी
गल्लां करनिया ढेर सोखलियां ने
जिह्ने देश दी सेवा 'च प्रति पाया
ओहना लाख मुसिबतां झल्लियां ने

इसे हिंदी में समझें तो...

अपने देश की सेवा करना बहुत कठिन है
बात करना बहुत आसान है
जो भी उस पथ पर चला
लाखों विपत्तियाँ सहन करनी होंगी।

वाकई उन्होंने न केवल लाखों विपत्तियां सहन की बल्कि एक उम्र देश के नाम न्यौैछावर कर दी।

जब पोते ने राम बोला, क्या आदिपुरुष के मेकर्स समझेंगे यह

घर के मंदिर में भगवान श्रीराम की भक्ति भाव से भरे दादा जी ने श्री रामचरितमानस खोलते हुए अपने ७ साल के पोते से पूछा, '' पोते, बताओ तो तुलसी दास जी के बचपन का नाम क्या था ?''

नित प्रतिदिन दादा जी के आस-पास प्रसाद में चढ़ने वाले किस्म-किस्म के भोग की लालसा में मंडरा रहे पोते ने खुद श्री रामचरितमानस भले ही न पढ़ी हो, लेकिन बुक स्टैंड पर रखी श्री रामचरितमानस के रचयिता के विषय और इस दुनिया के सबसे लोकप्रिय और सदियों से करोड़ों लोगों की आस्था को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करती इस महाकाव्य को लिखने के पीछे उन्हें मिली प्रेरणा की कहानी अक्सर ही वह अपने दादा के मुख से सुनता आया था।
उसकी बाल स्मृति में हर साल दशहरे पर भगवान श्रीराम के एक धनुष से विशालकाय रावण के पुतले का किसी शानदार आतिशबाजी में तब्दील हो जाना था तो उसे घर के बड़े-बुजुर्गों द्वारा दीपावली पर घर-मुहल्ले का दीपों और लड़ियों से रोशन होने के पीछे की वजह भी पता थी।

आखिर पोते ने बता ही डाला

''रामबोला, यही नाम था न दादा जी उनका, क्योंकि उन्होंने पैदा होते ही भगवान श्रीराम का नाम लिया था,'' अपने 75 साल के दादा जी की तरफ विजयी भाव से पोते ने जब जवाब दिया तो दादा भी यह सोचकर मुस्कुरा बैठे कि जिस लोक व्यवहार और आस्था के बीज का अंकुरण उनके दादा जी करके गए थे आज उसके लिए उन्होंने भी नई जमीन तैयार कर ली है. वे भी एक ऐसी विरासत अपनी आने वाली पीढ़ी को देकर जाएंगे जो उसके जीवन के तमाम उतार चढ़ाव में उसका सहारा बनेगी।

रामानंद सागर के राम 


छोटे पर्दे पर रामानंद सागर कृत रामायण ने सदियों से चली आ रही उसी आस्था को सदृश्य रूप से उतारा था. उसके एक-एक किरदार को लोग सच मान बैठे थे. अभिनय करने वाले खुद राम रस में ऐसे डूबे की किसी ने आजीवन शाकाहार अपना लिया तो कोई आध्यात्म जगत में पूरी तरह उतर आया. जिसने भी श्री रामचरितमानस पढ़ी थी उन्होंने रामायण सीरियल में पूर्ण रूप से उसे सजीव होते देखा। धारावाहिक के प्रसारण काल में बिजली विभाग की हिम्मत नहीं होती की वह चंद सेकेंड के लिए भी विद्युत की कटौती कर सके. प्रसारण काल में जहाँ सड़कों पर सन्नाटा छा जाता तो मुहल्ले में किसी एक घर में टेलीविजन होने पर किसी सिनेमाहाल सा अहसास होता। उस वक्त की जीवटता केवल उस दौर के लोग ही समझ सकते हैं. बाकी भगवान् श्रीराम तो छोड़िये मात्र रामानंद कृत धारावाहिक 'रामायण' की आस्था से जुड़े इतने रोचक प्रसंग हैं की उनपर कई किताबें लिखी जा सकती हैं.

वहीं आज आदिपुरुष जैसी फिल्म के निर्माण के पीछे नई पीढ़ी को किस दिशा में ले जाने की कोशिश की जा रही थी वह समझ से परे है. लेखक, निर्माता और निर्देशक भले ही फिल्म निर्माण में नई तकनीक का उपयोग कर लें, लेकिन आस्था के साथ किसी भी तरह के प्रयोग से दूर रहें, वर्ना बाद में उनकी लंका लगना तय है.

Corona majdur aur jindagi


कोरोना , मजदूर और जिंदगी





घर पर  रहते हुए भी सुकून का ना होना मजदूरो और कामगारो के लिए कोई नया नहीं है लेकिन कोरोना से बचने के चक्कर में पापी  पेट की वह चिंता जिससे पूरा परिवार प्रभावित हो ऐसा कोई उपाय या कोरोना की रोकथाम के निश्चित समय के ना होने से यह चिंता जब चिता की ओर बढ़ने लगती है तब बेबसी और लाचारी भरे दृश्यों की कल्पना ही ऐसे तबके को मजबूरी की नई परिभाषा गढ़ने पर मजबूर कर देती है |
 
कम शिक्षित और मज़बूरी में घर छोड़ने वाला यह वर्ग नए शहरो में जब दो जून की रोटी की तलाश में जाता है तो  परिवार की ख़ुशी के लिए कठोर और काँटेदार मजदूरी की चादर ओढ़ लेता है भले ही उसमे उसका दम घुटे या फिर उसकी आदत में शुमार हो जाए , वह उस चादर को नहीं छोड़ता कम पगार निर्वासित जीवन छोटी सी कोठरी फैक्ट्रियों से निकलता दमघोंटू  धुंआ मालिकों और सुपरवाइजरों की फटकार यह सब उसे अपने परिवार की बेबसी और लाचारी के आगे बौने लगने लगते है छोटी सी पगार  में बड़ा दिल रखने वाला यह वर्ग उसी वेतन के लिए पूरे जतन और ईमानदारी से काम करता है, जो उसकी मेहनत का पूरा मूल्य भी नहीं चुका पाती |
 
लॉकडाउन की शुरुआत में जहाँ पूरा देश बंद हो चुका था ये मेहनतकश गरीब एक – एक दिवस और पास पड़ी हुई एक - एक कर जुटाई गई पूंजी दोनों को जाते हुए देख रहे थे आखिर में लॉकडाउन दिन जब बढ़ने लगे और जमा - पूंजी जब ख़त्म होने लगी तो इनके सब्र और माली हालत दोनों ने इन्हे बंद कोठरियों से अपने – अपने घरो की ओर निकलने को मजबूर कर दिया कोरोना तो तब  मारता जब पेट इन्हे जिंदा रहने देता अजीब कश्मकश थी जिंदगी की ना कोई समझने वाला और नाही कोई इनके दर्द को कोई बांटने  वाला  रोजगार छीन चुके थे सबकी हालत एक जैसी हो चुकी थी मदद मिले या ना मिले कम से कम अपने घरौंदों तक  पहुँचने पर अपनों को खोजती हुई निगाहें तो थी वह लोग तो थे जो तकलीफ को समझकर मदद करते वह झोपड़ी तो थी जो किराया ना मांगती वह भाई  - बहन और सगे सम्बन्धियों की दिलासा देती बातें तो थी जो दर्द पर मरहम लगाती |
 
पटरियों पर ट्रेन न थी बसे बंद थी सड़को पर पहरा था जेबे खाली थी , पर हौसला जरूर था जो जानती थी की परिस्थितियां चाहे जितनी भी खराब क्यों ना हो सुकून के कुछ छण उन्हें अपनों के बीच ही मिलेंगे | फिर क्या था निकल लिए अपने कदमो के भरोसे उसी माटी की ओर जिसमे उनका बचपन बीता था , जो नंगे पैर भी मखमल सी मुलायम लगती , जिसमे लेटकर उसकी पवित्रता का एहसास होता | कोई साधन न था, हजारो मील की दूरी भी थी , बस दिलासा जरूर था की वहाँ पहुँच गए तो आपदा चाहे कैसी भी क्यों न हो लड़ने को हौंसला जरूर मिलेगा | सर पर गठरी रखे ,टूटी फूटी चप्पलें पहने लोगो के हुजूम अपने परिवारों समेत  सड़को पर निकलने लगे | कोई साइकिल पर , तो कोई रिक्शा चलाते हुए , तो कोई पैदल ही अपने – अपने घरो की ओर निकल पड़ा | सड़को पर तैनात पहरेदारों की फौज ने पहले तो कुछ को रोकने की कोशिश जरूर की , परंतु बढ़ती भीड़ और मजबूरी को समझते हुए ज्यादा देर रोक नहीं पाये | कुछ स्वयं सेवी संस्थाओ और राज्य सरकारो ने मदद भी की परंतु भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के इस विशाल वर्ग के लिए यह मदद ऊंट के मुंह मे वह जीरा के समान थी | किसी की चप्पलें टूट गई , तो कइयो के पैरो मे छाले पड़ गए , कुछ बीच रास्ते से ही दुनिया छोड़ गए लेकिन अधिकांश अपनी मंजिल तक पहुँचने मे कामयाब रहे |
घरो पर पहुँच कर तसल्ली तो मिली पर बढ़ते लॉकडाउन और खत्म होते संसाधनो ने इस वर्ग के माथे पर चिंता की लकीरे बढ़ा दी | सवाल ये भी था की अगर घर पर दो जून की रोटी का इंतजाम हो जाता तो ये घर छोड़ते ही क्यों ? फिर भी कुछ ने सब्जी बेचने से लेकर अन्य कामो मे हाथ आजमाया भी , परंतु ऐसा सिर्फ कुछ ही कर पाये | पेट और परिवार ने उन्हे कोरोना के इतर फिर से शहरो की ओर देखने को मजबूर कर दिया | परंतु बाजार की घटती क्रय क्षमता और कंपनियो की नाजुक होती हालत मे केवल कुछ ही कंपनियो ने दोबारा अपनी फ़ैक्टरियों को खोलना शुरू किया |
 
सरकार द्वारा कोरोना को देखकर बनाए गए नए नियमो और कम संख्या मे उपलब्ध रोजगार ने मजदूरो की दुर्दशा को और बढ़ाने का काम किया | छोटे शहरो मे कोरोना तो कब का खत्म हो चुका था बस रोना बाकी था |  बेरोजगारो की नई फौज मे कई और, कोरोना की जंग मे हार चुके सिपाही आ चुके थे | परंतु उनके घर की हालत भी धीरे – धीरे खस्ताहाल होने लगी थी और कोरोना से ज्यादा विकराल  रूप भूख ने ले लिया था इसलिए कोरोना को एक नियमित बीमारी की श्रेणी मे डालते हुए श्रमिकों के झोले फिर से अपनी – अपनी कर्मस्थली के लिए तैयार हो चुके थे और कोरोना कहीं पीछे अमीरों के लिए छूट गया था | आज छोटे शहरो मे कोरोना ना बाजारो मे दिखता है ना आपसी मेल – मिलाप मे | कोरोना तो सिर्फ राजनीति और अमीरों के लिए रह गया है बाकियों के लिए पेट की आग से बढ़कर कोई महामारी नहीं |
 
 

Issq ki dahlij

 इश्क की दहलीज





भाषा नैनो की जिनको आती है

बिन चीनी की , चाय भी उन्हें भाती है 


मिलते हैं ऐसे हर गलियों में 

जैसे भंवरे हैं हर कलियों में 


कुछ सीधे से दिखते कुछ सादे हैं 

अपनी मां के वे शहजादे हैं 


इश्क की एबीसीडी जो पढ़ने जाते हैं 

पकड़े डैडी तो , चाय की अदरक बन जाते हैं 


पूछे हैं प्रभु , मंदिरों में दर्शन किसके पाते हो 

सामने हमें छोड़, बगल में देख मुस्काते हो 


जो लाए थे फूल गुलाब का ,हमारे लिए 

सच-सच बताना अर्पित किस , देवी को किए 


मिटा देते हैं जो, प्यार के हर सबूतों को 

देख पापा के, बाटा वाले जूतो को 


ऐसे अजूबे ही , कटी पतंगों के लुटेरे है 

बाहर से सरल ,अंदर से छुछेरे हैं 


बड़ी रोचक सी इनकी  कहानी है 

बस यहीं से शुरू , इनकी जवानी है

आजकल




आजकल 

मैं अर्नब द्वारा की जाने वाली पत्रकारिता  से पूर्ण रूप से सहमत नहीं रहता हूँ  , लेकिन कांग्रेस की दमनकारी नीती देखकर कहीं ना कहीं  यह समझते देर नहीं लगती की अर्नब का पैर ऐसी जगह पड़ चुका है जहाँ से  शिवसेना और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों की कमजोर नस दर्द से  तड़फड़ा उठती है | कांग्रेस जहाँ  अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाना अच्छे से जानती है वही शिवसेना का अहम् सबसे बढ़कर है  |  

सीबीआई अभी तक सुशांत केस को लेकर किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाई है या फिर  उसे पहुँचने नहीं दिया जा रहा है  | ड्रग का एंगल ख़तम हो चुका  है | अब कुछ नहीं बचा सिर्फ आत्महत्या या फिर हत्या की गुत्थी सुलझाने के अतिरिक्त | 

उद्धव गलती पे गलती किये जा रहे है और भाजपा महाराष्ट्र में बढ़त ही बढ़त लिए जा रही है | अच्छी राजनीति की जा रही है भाजपा द्वारा ,सिर्फ अर्नब और कंगना के द्वारा ही महाराष्ट्र के समूचे विपक्ष  को  चने के झाड़ पर चढ़ा कर वहां कमल खिलाने के लिए गड्ढा खोदा जा रहा है जिसमे पूरी झाड़ का डूबना निश्चित है | 

समाचार चैनल अपना - अपना हित देखते हुए आम जनता को छोड़ टीआरपी की लड़ाई लड़ रहे है , इन सब को छोड़कर यह देखना दिलचस्प होगा की बिहार में सुशासन बाबू  का क्या होगा | बिना वारिस के राजनीति छोड़ना भी अच्छा नहीं लगेगा और कमजोर होती जेडीयू तथा क्षीण होते  स्वास्थ्य के भरोसे राजनीती करना भी मुश्किल होगा | भाजपा मगन है तो तेजस्वी दस लाख  के भरोसे निश्चिंत है | सुशील मोदी को आजीवन बिहार का उपमुख्यमंत्री घोषित किया जा चुका है हालांकि आपत्ति सबको है | वहीँ चिराग से लेकर कुशवाहा तक रात - रात भर जाग कर सपने देख रहे है तो पांडे जी केवल नाम के दबंग निकले ।




 

Dear diary

 डियर डायरी 


जब आप प्रेम मे होते है तो आप स्वयं मे नहीं होते बल्कि एक अद्भुत एहसास की घनी और कोमल चादरों की परतो से लिपटे होते है , जिसको शब्दो मे उतारना संभव नहीं  | यह एक ऐसा एहसास है जिसके चरम की स्पष्ट व्याख्या देने मे बड़े से बड़े प्रेमी भी बगले झाँकने लगे | ऐसे मे मात्र इसकी अनुभूति ही निराकार प्रेम को अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट करती है |





 

प्रेम मे खो जाना और प्रेम मे हो जाना ठीक वैसा ही है जैसे अथाह गहरे सागर मे मूकदर्शक बनकर स्वयं को डूबते हुए देखना | हालांकि प्रेम रूपी समंदर दुनियाँ का इकलौता ऐसा समंदर है जहां हमे पता चलता है की इसका असली मजा तो डूबने मे ही है जिसके बाद हम स्वतः तैरना सीख जाते है | ये अलग बात है की दूसरों को इस समंदर मे तैरना सीखाने का दावा करने वाले ना जाने कितने लोग गुमनाम हो गए |

 

 

प्रेम मे अक्सर ही हम साथ जीने मरने की कसमें खाते है , कई सारे ख्वाब , वादों के बगीचे मे सींचे जाते है , यहाँ तक की प्रेम मे डूबी भावनाओं की छाप को भी हम .......... प्रेम की दीवारों और प्रेम के पन्नो पर छोड़ जाते है | ऐसी ही एक भावना को प्रेम की स्याही भरकर , चाहत की कलम से डायरी के पन्ने पर लिखा था उसने , जो वर्तमान में अतीत को जिंदा रखे हुए थी ।


बेहद ही खूबसूरती के साथ , कला और वाणी के अद्भुत मेल से  बनी, लैंप पोस्ट की यह अनूठी रचना , दर्शकों के हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ जाती है ।



आखिर क्या थी वह भावना ? क्या लिखा था उस डायरी पर ?  और कैसी है यह कहानी ?

 ना केवल जानने के लिए बल्कि प्रेम में होने के लिए यह वीडियो अंत तक जरूर देखें ।




Purane bargad

पुराने बरगद​





मन की बेचैनी को शांत करने के लिए आज सुबह से ही एक शांत चित्त वाले श्रोता की तलाश जारी थी । विषाक्त और उद्देलित रक्त वाले नव युवकों से यह अपेक्षा पूरी ना होती तथा कसौटी जिंदगी वाली गृहणीयां कसौटी पर खरी ना उतरती , इसलिए हमारा सारा ध्यान जिंदगी भर टायर की तरह भार वहन कर , "पीपी और पोंपों " कि शोर युक्त आवाज सुनने वाले उस धीर पुरुष पर लगा था जिसकी चमक घिसने और रिटायर होने के बाद भी बरकरार थी ।

इंग्लिश भी साहब बड़ी अजीब भाषा है , ओपन के आगे रि जुड़ जाए तो रिओपन , न्यू के आगे जुड़ जाए तो रिन्यू और यदि टायर के आगे जुड़ जाए तो रिटायर का अर्थ ही बदल जाता है । बाकी दोनों में तो नई शुरुआत होती है लेकिन यहां टायर की नई शुरुआत ना होकर आदमी के  काम की ही छुट्टी हो जाती है ।

आसपास नजर दौड़ाने पर ऐसे बहुत से टायर माफ कीजिएगा रिटायर सज्जन पुरुष ध्यान में आने लगे जो हमारी मानसिक शांति के लिए उपयुक्त हो सकते थे यहां वृद्ध शब्द की अवधारणा उनकी चेतना के आगे सटीक न बैठती , क्योंकि वृद्ध होने का उम्र के आंकड़ों से कोई वास्ता नहीं , इसलिए उनके लिए इस या इसके पर्यायवाची शब्दों​ का प्रयोग मेरे द्वारा प्रतिबंधित है। 

बड़े शहरों से लेकर कस्बों तथा गांव में रहने वाले इन जैसे ज्ञान की खान को छोड़कर यदि हम अपने प्रत्येक सवाल उस गूगल से ढूंढते हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य ही है । खैर आखिर में हमारा सारा ध्यान उन सेवानिवृत्त पुरुषों पर था जो अपने घर की  ललिता पवार की सेवा से अभी भी निवृत्त नहीं हो पा रहे थे , और दिन भर के थके हारे अपने दोनों कानों को बहलाने संध्या  बेला पर निकला करते थे । कभी-कभी ऐसे पुरुषों के लिए महापुरुष शब्द भी लघुता को प्राप्त होता है । आज के वर्तमान परिदृश्य में जहां छोटी-छोटी बातों पर पति पत्नी के बीच नित्य ही लड़ाई झगड़े आम हैं , वहीं ऐसे पुराने बरगदो ने  ताउम्र क्रोध को अपने पास फटकने ना दिया और ना केवल अपनी गृहस्थी बल्कि अपने संपूर्ण परिवार की एकता व अखंडता को विषम परिस्थितियों में भी बनाए  रखना सुनिश्चित किया । चाहे वह छोटे भाई का हुड़दंग हो या बीवी की किचकीच के अलावा पिताजी की फटकार ही क्यों ना हो इन सब में भी इन्होंने अपना सामंजस्य और मानसिक संतुलन बनाए रखा ।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकला कि संध्या काल की बेला पर ही हमें ऐसे महापुरुषों के दर्शन हो सकते हैं । इसलिए सर्वप्रथम एक सज्जन पुरुष का रूप धर के ही हमने उनसे भेंट करना उचित समझा । हमने अपनी कटप्पा वाली दाढ़ीयों को काटना मुनासिब समझा और आयुष्मान खुराना बन अपने अमिताभ बच्चन की तलाश में निकल लिए।

आखिर ढूंढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं फिर इंसान क्या हैं । मोहल्ले की मेन सड़क पर स्थित चाय की दुकान में हमे बगल की गली वाले उन वर्मा जी में अपनी पूरी संभावना नजर आई जो अपनी राबड़ी देवी के लिए तरकारी (सब्जी ) लेने निकले थे और चाय के दो प्यालो के साथ एक प्लेट प्याज की गरमा गरम पकौड़ियां धनिया की चटनी के साथ ठिकाने लगा चुके थे।

सर्वप्रथम तो नजर मिलने पर उन्होंने अपनी तटस्थता बरकरार रखी परंतु जब मैंने झुक कर उनका अभिवादन किया तो उन्होंने मधुर मुस्कान के साथ दाहिना हाथ ऊपर करते हुए मजबूती से अपनी प्रतिक्रिया दी । जब मैं उनके पास कुर्सी खींचते हुए बैठने लगा तो उन्होंने बैरे से एक चाय की प्याली और लाने का आदेश दिया । 

 हां तो मैंने भी वर्मा जी का हाल चाल लेते हुए अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखने में तनिक भी देर नहीं की सर्वप्रथम तो वह ध्यान से सुनते रहे परंतु कुछ छण पश्चात उनके चेहरे की चमक फीकी पड़ने लगी और सवाल के खत्म होने पर वह मेरी ओर टकटकी लगाए देखे जा रहे थे तो सवाल यह था कि

 ऐसी क्या वजह है कि कुछ ही दशकों पूर्व से चली आ रही संयुक्त परिवार की अवधारणा खत्म होने के बाद , एकल परिवार के पुत्र पिता व मां को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते , या जिम्मेदारी शब्द को हटा भी दे तो क्या​ ज्यादातर पुत्र और पुत्रवधू के लिए पिछली पीढ़ी उनके परिवार का हिस्सा नहीं होती , और यदि कुछ जगह साथ-साथ हैं तो भी उपेक्षा का शिकार क्यों है । 

अचानक ही मुझे ध्यान आया कि समाजशास्त्र के नामी प्रोफ़ेसर वर्मा जी के पास इन सवालों के जवाब होते हुए भी वे उसे व्यक्त नहीं कर सकते क्योंकि बाहर रहने वालें​ उनके दोनों बेटे विगत 10 वर्षों में एक बार भी उनका कुशलक्षेम पूछने नहीं आए शायद उनके साथ वर्मा जी भी उन्हें भूल चुके थे और आज मैंने अपनी जिज्ञासा हेतू उनकी खोई हुई अभिलाषा की याद दिला दी , अब मेरी जिज्ञासा  ग्लानी में बदल चुकी थी ।

Wo chidiya

वो चिड़िया




वो चिड़िया फिर कब आएगी
जो कभी इस आंगन मे चहकती थी
निर्भय होकर दाना चुगकर , पास मेरे वो फुदकती थी

वो चिड़िया फिर कब आएगी
जो तिनको से घर में मेरे
अपना घरौंदा बनाती थी
साथ अपने खेलने को
खुद जैसी औरों को लाती थी

वो चिड़िया फिर कब आएगी
जिसको हम दाना देते थे
घर को मेरे बना घोंसला
मिसरी सा मीठा गाती थी
सन्नाटे के इस आलम में
रौनक का दीप जलाती थी

जाने कहां गुम हुई वो
ना जाने कौन सा भय उसे अब लगता है
क्या वो चिड़िया फिर से आएगी
जिससे ये आंगन चहकता है

Corona artical


कोरोना को अभी हल्के में लेने की जरूरत नहीं है। अगर हमने इसे हल्के में लिया तो यह हम पर कितना भारी पड़ेगा इसी संदर्भ में हिन्द भास्कर वाराणसी  संस्करण में ८/७/२० को प्रकाशित मेरा यह लेख -


korona and lockdown

कोरोना और लाकडाउन 





लॉक होके डाउन होना जिनको पसंद नहीं है उनके लिए  लॉकअप की सुविधा आसानी से उपलब्ध है।  आसपड़ोस क्या होता है और नए मेहमान का स्वागत हम कैसे करते है लॉकडाउन में पैदा होने वाले बच्चे कभी नहीं जान पाएंगे । कुछ लोग सेहत पर ध्यान दे रहे है तो कुछ नए तरह की पागलपंती करते हुए दिख जायेंगे लेकिन उनका क्या जो बिना कुछ किये ऐसे लम्हो को जाया कर रहे है । 



खैर कोरोना है तो सब खैरियत है , सड़को पर दुर्घटना नहीं हो रही , जालंधर  से हिमालय दिखने लगा , यमुना और अन्य नदिया स्वच्छ होने लगी , महानगरों के  छोटे बच्चो को दादा - दादी क्या होते है छू कर पता लगाने का मौका मिला और तो और पुरुषो के अंदर के संजीव कपूर ने आलू , बैगन पर करतब दिखाना शुरू कर दिया , बची खुची कसर रामायण ने शुद्ध हिंदी सीखकर पूरी कर दी। 

समझ से परे तो यह रहा की महिलाओ ने चुगलियों के इस अथाह सागर को छोटे से उदर में कैसे समाहित कर के रखा हुआ है जिसका आकर समय की धारा में दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। वस्तुओ के आदान प्रदान से सुगन्धित आस पड़ोस के रिश्ते कैसे स्वयं को प्रसार भारती होने से रोके हुए है।  उन भक्तो का तो और भी बुरा हाल है जो प्रतिदिन मंदिर की आरती में अपनी उपस्थिति कार्यालय की उपस्थित से ज्यादा सुनिश्चित किये रहते है।  चाय की दुकानों के वे रणबांकुरे जो पल भर में इस देश की सरकार गिराने का माद्दा रखते थे खुद की सरकार की निगरानी में घरो में कैद है उनपर तो मानो वज्रपात ही हो गया। पान को ईश्वर का भोग और पंसेरी को ईश्वर का दूत समझ कर दिन भर पान का भोग लगाने वाले पीके  सरीखे मानवो की पीक ( थूक ) से दीवारे और सड़के रंगविहीन हो चुकी है। 

 अब इस रंगविहीन दुनियां को चाइना की छालरो से रंगीन भी नहीं बना सकते।  इतने दिनों से सांप सीढ़ी खेलने पर यह समझ में नहीं आया की कैसे सौंवे स्थान पर रहने वाला आदमी विजयी होता है और पहले या दूसरे  स्थान पर रहने वाला आदमी हार जाता है । 

जहाँ एक तरफ इस बिमारी के इलाज में डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों की संयुक्त टीमें मुस्तैदी से अपनी भूमिका निभा रही है वही दुनियां से हल्के होने के चक्कर में कुछ लोग इसे हल्के में ले रहे है। खैर सरकार के पास इसके हर रूप के इलाज की व्यवस्था है और हमारे पास इससे बचने का उपाय जिसे मानना या ना मानने का असर हमारे और हमारे परिवार के अतिरिक्त सम्पूर्ण समाज पर पड़ सकता है।  इसलिए हठधर्मिता छोड़े और बचाव धर्म का पालन करे। 

Achha hai

अच्छा है

ख्याल अच्छा है , की शायद ये साल अच्छा है
नाउम्मीदी के परिंदो से तो, उम्मीद का जाल अच्छा है

मन का ना हो तो टीस नहीं , ढंग का ना हो तो खीस नहीं
मिले ना मनमीत तो क्या प्रीत नहीं ? चल रहा है जो कुछ भी
फिलहाल अच्छा है


गुरुर तुम्हारा भला हमे क्यों भाये
छोड़ के भी तुमको , हम कैसे जाये
मन का वहम नहीं ये , बस दिल का जंजाल अच्छा है

मथुरा से लेकर काशी तक , मुझसे लेकर साधू तक
उलझन ही उलझन है मन में , सुलझ गया कुछ ये ख्याल अच्छा है 

हुई पराजय , तो क्या गम है
लड़ा जी भरके , क्या ये भी कम है 
मन का जीता , जीतूंगा एक दिन
क्योंकि ये साल अच्छा है।

You and me

तू अउर हम

का भइल  जौन दिल टूट गईल
व्हाट्सएप के खेला में संघतिया छूट गईल
पइसा खातिर घूमले देश-विदेश
अ जाएके बेला पे मांई रूठ गईल

बड़का बनके बड़का भाई छूटल
जाने कौन स्नेह से भौजी रूठल
उ का बूझे लाल बुझक्कड़
कहे के धन्ना दिल से फक्कड़

भरल मिर्चा में प्यार भर के
छोड़े आइल जवार भर के
कौन कमाई सबसे बड़का
सोचींहे कइसे मॉडर्न लड़का

घर पे बाप निहारत बा
लइका रोज चरावत बा
दिन उ आपन भूल गईल
मेहरारू संग झूल गईल
ससुरारी रोज सोहावत बा
सैर सपाटा और दावत बा

सुख के इ कुल झूलौना  हउंए
दुख में तहसे भागल फिरिहे
छोड़ा मरदे अब ना समझाइब
मिर्ची लगी तहके जो सच बतलाइब

तहार दुनिया तहके मुबारक
अंग्रेजी बोलब तब पटक के मारब
To be continued....







तूँ और मैं


नहीं था तूँ
तो मैं मैं था
था तूँ तो मैं तुमसा
बना जब तुमसा
मैं तूँ पर तूं ना मेरा
तूँ भी वो तूँ ना रहा
मैं बना जिस तूँ जैसा
मैं अब मैं जैसा
तूँ अब ना जाने कैसा
तूँ बना जैसा
रंग जिसमे चढ़े ना ऐसा
क्या तूँ - क्या मैं
लगन ऐसी थी उतरन वैसी
मैं अब आईने जैसा
तूँ एक मुखौटे जैसा
मैं अब ना तुझसा
तूँ ना अब मुझसा



a marriage in bihaar

ए मैरिज इन बिहार 

a marriage in bihaar


दूल्हे का भाव और दूल्हे के छोटका भाई का ताव देखकर रिश्तेदारों को यह समझते देर न लगी की आज बिहारी दूल्हे और उसके भाइयो का भाव रहर के दाल की तरह बढ़ा हुआ है ।  खुद को हृत्विक  समझने वाले दूल्हे को भले ही  पूरा जवार राजपाल यादव समझता हो लेकिन मायावती सरीखी उसकी बुआ और  गांव देहात के चढाकू फुफ्फा की नजर में वो कोई मिल गया वाला हृत्विक ही था ।  लड़के के फूफ्फा मुंहबोले धन्ना सेठ थे जिनकी पूरी जिंदाई दूसरो को नीचा और खुद को बबूल के पेड़ जितना ऊँचा दिखाने में निकल गई और  फुआ , मिसरी  जितनी मीठी और सेवन ओ क्लॉक ब्लेड जितनी धारदार  ।   

दरवाजे पर पहुँचते ही तिलक की व्यवस्था देखकर ऐसा लगा जैसे  सब कुछ राम भरोसे हो , अरे राम भरोसे गांव के कैटरिंग वाले का नाम था जिस पर गांव के समृद्ध और बड़का लोग कम ही लोग भरोसा किया करते थे।  किन्तु किफायती और बचतशील होने के नाते लड़के के इंजीनियर पिता ने  पी डब्लू डी के टेंडर की तरह ही शादी का टेंडर  50  %  डिस्काउंट के भरोसे  राम भरोसे को दे दिया था । पूरे गांव की जनसँख्या को ध्यान में रखते हुए आधे लोगो की व्यवस्था की गई , भाई अब राम भरोसे की व्यवस्था थी तो इस  इस पर शक कैसे किया जा सकता था। प्रत्येक स्टाल पर एक - एक मुश्तंडे को बैठा दिया गया , जो  किसी भी मेहमान और गांव वाले को जाने पर एक ही जवाब देता " तिलकहरू के आने पर ही स्टाल खुलेगा " और जब तिलकहरू आ गए तब जवाब में परिवर्तन कर दिया जाता  " अबहिन मालिक मना किये है " . बेचारा  चाट का स्टाल छोले के वियोग में ही दुखी था उधर पूड़ियाँ भी डालडे को कब तक बर्दाश्त करती।  हालाँकि कई रिश्तेदार यह बताने में असमर्थ रहे की आखिरकार स्टाल में पकवान क्या थे , कइयों की तो शंका यही थी की शायद ईंट पत्थर सजाकर रख दिए हो। 

गांव वाले ठहरे भाई पटीदार वो तो बीप ... बीप  की गालियां देते निकल गए परन्तु वे रिश्तेदार जो  शादियों में अपने अपने  साथ एक स्टेपनी लेकर चलते है वे क्या मुंह दिखाते।  साथ ही समय से घर पहुँचने की मजबूरी अलग।  रुकने वाले रिश्तेदारो को ऐसा लगने लगा था जैसे उन्हें किसी जेल में बंद कर दिया गया हो और खाना जेलर के आने के बाद ही मिलेगा । दूल्हे के घर वालो के भाव देखकर नारद जी को भी विश्वास हो गया था की पूरे ब्रम्हांड में दिग्विजय सिंह की शादी के बाद कोई खुश है तो यही परिवार । 

आखिरकार कई मेहमान स्टाल का मुंह देखे बगैर ही अपने - अपने घरो को लौट गए , कष्ट तो तब बढ़ा जब घरवालों ने यह कहा की " आ गए पनीर - पूड़ी चाप के " . अब बेचारे किसे बताते की कितनी पूड़ी खाकर आये है और कितनी इज्जत से मिठाई परोसी गई ।

खैर दूल्हे का तिलक शुरू होता है और जून की गर्मी से बचती - बचाती मामी , मौसी , फुआ ( बुआ ), भौजाइयां और गांव जवार की वे लड़कियाँ और औरते जिन्हे समारोह से ज्यादा चढ़ने वाले चढ़ावे की गिनती और क्वालिटी में नाक नुक्स निकालना आता है ने गीत कम गालियों की जो बौछार कि  , की दूल्हे के साले और ससुर यह नहीं समझ पाए की वे तिलक चढाने आये है या फिर पूरे गांव से पटिदारी का मार करने। 

गर्मी अगर कहीं पड़ रही थी तो वो जगह थी दूल्हे के भाई और पिता जी के दिमाग में।  खैर रिश्तेदारों ने अपनी इज्जत खुद ही मेंटेन की और गांव वालो ने इनकी इज्जत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । हां, समारोह में  मिठाई और स्टाल  के आइटम अगर किसी ने देखा था तो उससे बढ़कर दुनियां में  खुशनसीब कोई भी नहीं । 

मैं तो यहाँ दूर बैठा कोल्ड कॉफी और पनीर रोल के साथ शादी का आँखों देखा हाल सुन रहा था । लालू के जमाने से ही मुझे बिहार से डर लगता है । 

jewan mantr



जीवन मन्त्र  

jewan mantr


शब्दों के जाल बिछाने वाले 
कुछ कर्मो के  करतब दिखलाओ 
वाणी से मिसरी घोलने वाले 
तुम मर्म किसी का क्या जानो 
अर्थ का अनर्थ बनाने वाले, कुछ विषधरों को तुम अब पहचानो 
है स्पष्ट ,सरल , गूढ़  मन्त्र जीवन का ये 
तुम मानो या ना मानो 

कुछ निंदा करके क्या पाया 
सिर्फ जिन्दा रहके क्या पाया 
क्यों उचित को अनुचित में बदला 
रिश्तो को विचलित करके क्या पाया 

कुछ दम्भ भरा खुद का यूँ 
कुछ अहम् हृदय में समाया 
ज्ञान का दीपक बुझा दिया कब 
देर समझ में ये आया 

कब विवेक को छोड़ दिया तूने 
कब धैर्य तुझे ना रास आया 
लोभ ने छीनी अन्तः ज्योति 
मोह में तूं है अंधराया 

कब छूटे तुझसे ये धरा 
क्या जग को तूं दे पाया 
यहाँ जन्म ना तेरी चाह से 
मृत्यु तक तूं ये ना समझ पाया 




hoshiyar ki talash


होशियार की तलाश 


शरीफ आदमी की तलाश करते - करते ना जाने कितने ही  शराफत वालो के असली रंग देखने को मिले।  शरीफ दिखना और शरीफ होना इस फर्क को समझने में दिमाग  की कई नसों ने काम करना बंद कर दिया । वास्तव में आज बेवकूफ कोई भी नहीं है , लेकिन फिर भी होशियार लोगो की कमी देखने को मिलती है ।  होशियारी की परिभाषा जानने के लिए जब बुजुर्गो का अनुभव लेने पहुंचे तो पता चला की , आज के युग में जो पैसा कमा रहा है ,चाहे माध्यम कोई भी और कैसा भी क्यों ना हो वो सबसे होशियार है।  हालांकि ऐसे अनुभव बांटने वाले खुद अपने बेटे - बहु पर आश्रित थे । कुछ के अनुसार दूसरो से चालाकी पूर्वक काम निकालने वाला भी आज के युग में होशियार की उपाधि धारण करता है। 


कुछ सज्जनो ने आपस में विचार विमर्श के फलस्वरूप  ऐसे लोगो को होशियार बताया जो सरकारी नौकरी करते हुए घर से दूर एकांत में परिवार ( धर्मपत्नी ) के साथ जीवन यापन कर रहे है । ना घर पर रहेंगे ना रिश्तेदारों से लेकर नातेदारों का कोई चक्कर रहेगा । 

महिलाओं की राय इतर थी।  उनके अनुसार वह बहु ज्यादा होशियार है जो शादी के बाद बेटे के साथ चली जाती है और घर पर सास - ससुर का हाल - चाल लेने के लिए हफ्ते में एक बार जिओ के मोबाईल से आमने - सामने बतिया लेती है , हाँ दिखावटी मिठास में कोई  कमी नहीं करती । 

इन तथ्यों से मुझे यह समझ में आ गया की होशियार वही है जिसने अपनापन , दया , मर्यादा , लज्जा , सेवा , मृदुता ,फर्ज और कर्तव्य जैसे अवगुणो का त्याग करते हुए अवसरवादिता , घमंड , लालच , निष्ठुरता , कटुता या कठोरता के साथ धोखा देने जैसे सद्गुणों को अपना लिया है। 

मैंने इतिहास को थोड़ा टटोलने की कोशिश की तो पता चला कबीर गरीब होते हुए भी होशियार थे और सिकंदर विश्व विजेता होने के बावजूद भी नासमझ था। 
अपना काम किसी भी सूरत में निकलने वाले को इतिहास ने मतलबी और और इसकी हद पार करने वाले जयचंद जैसो को गद्दार कहा है।
पारिवारिक  जीवन में ऐसी बहुओं को समाज में कोई इज्जत नहीं दी जाती थी जो अपने घर की मान मर्यादा के साथ बड़ो की सेवा ना करती हो।  इन बड़ो में चचेरे सास - ससुर से लेकर सम्पूर्ण कुटुंबवासी आते थे। 

इतिहास और वर्तमान की बदली हुई यह परिभाषा कहीं  ना कहीं समाज की उस बदलती सोच को दिखाती  है जिसमे जाने - अनजाने खुशियों की नई परिभाषा गढ़ी गई है। और हमरा  मन उसी को पाने की लालसा कर बैठता है।  समाज, परिवार से मिलकर बनता है और परिवार उसके सदस्यों से , सदस्यों को तोड़ कर परिवार का विघटन जारी है और इसी के साथ ही समाज का खोखलापन भी। 

मेरी होशियार की परिभाषा की तलाश जारी है क्योंकि समाज का जो अंश बचा हुआ है, वो निश्चित तौर पर किसी बेवकूफ के भरोसे तो नहीं चल रहा होगा। 




jhandu baam jindagi

झंडू बाम जिंदगी 


गोविन्द चार साल से जिस सामने वाली को लइनिया रहा था , आज बाजार में उ लड़की उसके भाई के साथ लेमन जूस पी रही थी , उ भी पूरा मुस्की ( हंसकर ) मारकर । उधर कॉलेज वाली रोज उससे अपना प्रोजेक्ट पूरा करवाती थी । गोविन्द भी इसी चक्कर में अपने अंदर हाई क्वालिटी ला कर , पूरा मेहनत और लगन से प्रोजेक्ट पूरा कर रहा था जैसे यूपीएससी का मेंस हो और इंटरव्यू में उसे इ लड़की प्रपोज करने वाली है । लेकिन जैसे ही प्रोजेक्ट पूरा हुआ इहो लड़की थैंक्यू भैया बोल कर निकल ली।
गोविन्द को लगा की जिंदगी में कुछो अच्छा नहीं हो रहा है , सारा मेहनत बर्बाद है । तभी उसके कॉलेज का रिजल्ट आता है और वो पूरे कॉलेज में दुसरे स्थान पर रहता है। गोविन्द सोचता है चलो कुछ तो अच्छा हुआ , तभी उसे सामने बोर्ड पर पहला स्थान पाने वाले का फोटो दिखाई दिया , यह वही लड़की थी जिसका प्रोजेक्ट गोविन्द पूरा कर रहा था , सारा ख़ुशी एकदमे से गायब हो गया ।
गोविन्द निराश होकर घर पहुंचा , लगा आँगन की छावं में कुछ आराम मिलेगा , तभी पता चलता है सबकी रजामंदी से उसके भाई की शादी सामने वाली लड़की से तय हो गई है और आज अंगूठी पहनाई की रसम है । अब तक गोविन्द को लगने लगता है की वाकई में उसकी जिंदगी झंड हो गई है । तभी सामने से एक सुन्दर सी लड़की आती है जिसे देखकर गोविन्द मुंह फेर लेता है। लेकिन वह गोविन्द के पास जाकर , उसका हाथ पकड़कर , पूछती है मुझसे शादी करेंगे ?, गोविन्द को सहसा विश्वास नहीं होता। गोविन्द को ऐसे देखकर वह दुबारा पूछती है , इस बार गोविन्द हाँ बोल देता है , तभी सारे लोग हंसने लगते है ,, क्योंकि गोविन्द आँगन में बंधी भैंस से कुछ बड़बड़ा रहा था।

लेखक के क्वोरा पर दिए एक जवाब से  साभार 

laal musafir

लाल मुसाफिर 


दोपहर के तीन बजे मुंबई सेन्ट्रल स्टेशन पर उतरने के बाद एहसास होता है की की शायद यह सपना तो नहीं , क्योंकि देश और दुनिया के व्यस्ततम स्टेशनों में से एक मुंबई सेंट्रल पर सिवाय मोटे , बिल्ले जैसे चूहों के सिवा किसी एक  प्राणी का नामोनिशान तक नहीं था ।

परन्तु कुछ ही देर में पता चल जाता है यह सपना नहीं हकीकत है।  घबराहट के साथ डर भी लग रहा था , शायद ऐसी कल्पना हॉलीवुड की फिल्मो में की जाती होगी , परन्तु वीरान पड़ा स्टेशन शहर में किसी अनहोनी  की पुष्टि कर रहा था। आखिर एकाएक सारे के सारे मनुष्य चले कहा गए ।  ट्रेन जिससे मैं उतरा था पिछले स्टेशन पर ही खाली हो गई थी और इंजन के पास जाने पर पैरो के नीचे की जमीन भी खिसक गई क्योंकि इसमें तो इंजन था ही नहीं  । 

मेरी नई कहानी का एक छोटा सा अंश पूरी कहानी श्रृंखलाबद्ध जल्द ही आपके सामने होगी - 

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