हर पिता मर्द होता है...

 हर पिता मर्द होता है...


पिता पता थे ये बात पता थी

किया कुछ भी न था लेकिन खता थी

बिना बताए भी बीच राह में कोई क्या जाता है?

चले गए वो जहां से लौट न कोई आता है


डाकिया के लिए अब नाम नया है

आने वाले हर पैगाम में प्रणाम नया है

अगर रिश्तों पर यकीन हो तो समझ आएगा

बिना पिता के दुनिया का कोई भी मुकाम क्या है?


वक्त ने दीवार को छत बना दिया -२

कच्ची उम्र में ही कद बढ़ा दिया

नींद में सुकून अब उतना ही है

पांव में छालों के बीच जगह जितना भी है


सुनाने की जगह अब सुनने लगे हैं

राशन और दवा के खर्चे गिनने लगे हैं

अब सपने अपने नहीं रहे

और अपने भी अपने नहीं रहे


मन अब उदास नहीं रहता

शायद किसी के पास नहीं रहता

दिल भी अब कुछ संभल सा गया है

चढ़ता हुआ दिन अब ढल सा गया है


पिता कहते थे कद्र जाने के बाद पता चलती है

खामोशी भी कारवां गुजर जाने के बाद पता चलती है

जो नहीं पता चलता वो अपना ही दर्द होता है

कंधों पर अपने घर संभालने वाला ही

असली मर्द होता है...


- रोहित राय



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